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    राजस्थान पिछड़ा वर्ग विधेयक, 2017 ध्वनिमत से पारित

    जयपुर, 26 अक्टूबर। राज्य विधानसभा ने गुरुवार को राजस्थान पिछड़ा वर्ग (राज्य की शैक्षिक संस्थाओं में सीटों और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों और पदों का आरक्षण) विधेयक, 2017  ध्वनिमत से पारित कर दिया।
                     सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. अरुण चतुर्वेदी ने विधेयक को सदन में प्रस्तुत किया। विधेयक पर हुई बहस का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यह विधेयक सामाजिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर लाया गया है। उन्होंने कहा कि  आरक्षण के संबंध में जो भी निर्णय विभिन्न न्यायालयों के द्वारा दिए गए हैं, उनकी पूरी समीक्षा तथा अध्ययन उच्च स्तरीय समिति तथा पिछड़ा वर्ग आयोग के द्वारा की गई है,  तथा उसके विस्तृत अध्ययन के बाद ही यह विधेयक लाया गया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण पर गठित विभिन्न आयोगों द्वारा 5 जातियों को घुमन्तू तथा अर्धघुमन्तू माना गया है, जिन्हें आरक्षण प्रदान कर शैक्षिक तथा सामाजिक न्याय दिया जाना आवश्यक है।
                 डॉ. चतुर्वेदी ने आश्वस्त किया कि यह विधेयक आज की परिस्थितियों के अनुसार है तथा विशेष पिछड़ा वर्गाें के हितों का संरक्षण करता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार सामाजिक न्याय के सिद्वान्त का पालन करती है तथा आरक्षण प्राप्त कर ये समुदाय शैक्षिक तथा सामाजिक स्तर पर समानता के स्तर पर आ सकेंगे। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भिन्न अन्य पिछड़ा वर्गों को प्रवेश और नियुक्तियों में आरक्षण सर्वप्रथम वर्ष 1994 में दिया गया था। उस समय 52 जातियां पिछड़ा वर्गों के रूप में सूचीबद्ध थीं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पिछड़ा वर्गों की सूची में 91 जातियां सम्मिलित हैं और वे राज्य की कुल जनसंख्या के लगभग 52 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहा कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने राजस्थान में पिछड़ा वर्गों की जनसंख्या 52 प्रतिशत के आसपास होने का अनुमान लगाया है, इसलिए जनसंख्या की मात्रा को देखते हुए पिछड़े वर्गों के आरक्षण के प्रतिशत को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
                 डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा नियुक्त जस्टिस गर्ग की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति एवं राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपने प्रतिवेदनों में स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला है कि इन्द्रा साहनी के मामले में परिकल्पित विशेष परिस्थितियां राज्य में विद्यमान है और पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए 50 प्रतिशत की सीमा से आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार हैं।
             उन्होंने कहा कि सामाजिक वर्गों की समानता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने वर्ष 2012 में प्रस्तुत रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि कुछ जातियां अत्यधिक पिछड़ी हुई हैं और उनकी सामाजिक व शैक्षणिक उन्नति के लिए विशेष संरक्षण की आवश्यकता है। उस सिफारिश के आधार पर पांच जातियों (बंजारा/बालदिया/लबाना, गाडिया लोहार/गाडोलिया, गूजर/गुर्जर, राईका/रैबारी/देबासी, गडरिया/गाडरी/गायरी) का एक अलग वर्ग गठित किया गया और उनको वर्ष 2015 में एक अलग अधिनियम द्वारा 5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इसे राजस्थान उच्च न्यायालय ने कतिपय कमियों की ओर संकेत करते हुए अभिखंडित कर दिया।
                  सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने 2015 के अधिनियम की कमियों का परीक्षण करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। समिति ने समाज के विभिन्न वर्गों के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन के पश्चात् अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को निर्दिष्ट किया गया। इसके पश्चात् आयोग ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और सिफारिश की कि इन जातियों को अति पिछड़ा वर्ग के रूप में एक पृथक वर्ग में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि  इन जातियों को इन्द्रा साहनी के मामले में अधिकाधिक 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर 1 प्रतिशत और उस सीमा के बाहर 4 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस प्रकार इन जातियों का कुल आरक्षण 5 प्रतिशत होना चाहिए और समग्र पिछड़े वर्ग का आरक्षण 26 प्रतिशत होना चहिए।
                 डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा अब तक विशेष पिछड़ा वर्ग में 2 हजार 572 लोगों को नौकरी प्रदान की गई। साथ ही राज्य सरकार  द्वारा विशेष पिछड़ा वर्गों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं।
               इससे पहले सदन ने विधेयक को जनमत जानने हेतु परिचालित करने के संशोधित प्रस्ताव को ध्वनिमत से अस्वीकार कर दिया।
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