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    श्मशान के भय से मुक्त मन ही मानस मसान-मोरारी बापू

    वाराणसी.23/10/2017 (विकास राय) @www.rubarunews.com >> महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के सामने गंगा पार श्री सतुआ बाबा गौशाला में आयोजित श्री राम कथा में संत श्री मोरारी बापू ने श्मशान की ब्याख्या करते हुवे इसके तीन प्रकार बताये और इसका विवेचन करते हुवे कहे की भौतिक मसान भयावह नजर आता है। मन से यह भय निकल जाता है तो मानस मसान हो जाता है।
             इससे जो मुक्त हो गया मसान को सुहावन पायेगा। उसे यह श्मशान भी तीर्थ व देवालय की तरह नजर आयेगा।
            वास्तव में यह आधिदैविक मसान है जहां विश्वास-श्रद्धा, धर्म भक्तिमयी  बुद्धि व संयम के रूप में प्रभु शिव-पार्वती, नंदी ,गंगा और कछुआ का वास है। चिताएं आरती की लौ का आभास करायेगी। लोग हर मंदिर से घर लौट आते है लेकिन जो इस आधिदैविक मंदिर को पहचान जायेगा इसमें जायेगा तो उसके गर्भगृह में मिल जायेगा। मृत्यु उसके लिए उत्सव हो जायेगा।
           वहीं आध्यात्मिक श्मशान में ज्ञान की जागृति होती है और ज्ञान का जाग जाना ही अध्यात्म है। आपने कहा की गौर करें तो डर तो जीवित का होगा, जो मर गया वह भला बिगाड लेगा।
          संत श्री ने कहा की यमराज व धर्मराज एक ही है। दुष्ट को दंड देने वाली चेतना को यमराज और धार्मिक लोगों को सुख देने वाली चेतना को धर्मराज कहते है।
           जीव को उसके कर्म के अनुसार ही धर्मदूत और यमदूत मिलते है। धरा से उत्तम स्वर्ग कहीं नहीं है। पूरी धरती पर भारत, भारत मे काशी, काशी में मणिकर्णिका जैसा दूसरा स्थान और कहीं नहीं है। यहां भगवान शंकर कान में राम नाम की मणि देकर मुक्ति प्रदान करते है। यहां भक्ति व मुक्ति दोनों का भण्डारा है। यह ब्यक्ति पर है वह क्या चाहता है।
    *मानस सर में जो डूबा हो गया पार*
         संत श्री बापू ने कहा की मानसरोवर से भी पवित्र सरोवर है मानस। मानसरोवर में कोई डूब जाये तो उसकी मृत्यु हो जायेगी लेकिन मानस सर में डूबने वाला पार हो जायेगा, मोक्ष को पायेगा। मानसरोवर किसी सत्ता के अधीन है, वहां जाने के लिए परमिशन की जरूरत होती है। जबकि मानस सर परम स्वतंत्र है और इसमें गोते लगाने के लिए बस इच्छा मात्र होनी चाहिए।
         इसे खुद परमहंस शिव रामकथा के रूप में सुनते है-सुनाते है। भगवान शिव इसके अनादि कवि व गायक है। मानस में अप्रकट और अपरोक्ष को केवल गुरू कृपा से ही जाना जा सकता है। गुरू आश्रित के लिए गुरू वचन ही सर्वोच्च है। गुरू वचन के आगे और उससे बडा कोइ वचन नहीं है। सद्गुरु के वचन पर भरोसा रख कर उसे हमेशा गुप्त रखना चाहिए।मुख्य यजमान मदन पालीवाल महामण्डलेश्वर सन्तोष दास महाराज ने ब्यास पूजा की।


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