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    सम्पूर्ण क्रांति के जनक लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती

    बलिया11/अक्टूबर/2017 (rubaruUPdesk) @www.rubarunews.com >> आज जय प्रकाश नारायण की 115 वी जयंती है । जयप्रकाश नारायण को लोकनायक की उपाधि दी गयी है।इस महामानव की जीवन वृत पर हम नजर डालते है तो प्रतीत होता है कि विषम भगौलिक वातावरण में स्थित घाघरा से घिरा बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा पर मौजूद सिताब दियारा गावं के लाला टोले में सिंचाई विभाग के कर्मचारी पिता हरखू दयाल श्रीवास्तव एवं माता फुल रानी देवी की चौथी संतान एक दिन लोक की ताकत और हैसियत को परिभाषित कर तानासाही हुकूमत को उखाड़ फेंकने का काम करेगा।साथ ही साथ एक ऐसे समाज के निर्माण का भी अगुआ बनेगा जो भूदान और सर्वोदय जैसे आंदोलन के बल बुते पल्वित और पोषित होगा ।
            आज जब हम आजादी की 70वीं सालगिरह माना रहे है तो एक बात जरूर महसूस कर रहे है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र शैशवास्था से प्रौढ़ावस्था में बढ़ते हुए दिन प्रतिदिन अपने गैर जिमेदारना और तानाशाही रवैये के कारण आम आदमी के लिए अप्रासंगिक हो रहा है और तब हमें यह महसूस होता है कि अगर जय प्रकाश और लोहिया जैसे नेता होते तो इस बेलगाम होती सत्ता को जन की ताकत का एहसास दिलाकर लगाम लगाने का काम करते।
                  प्रारंभिक शिक्षा गावं से ग्रहण कर माध्यमिक शिक्षा जेपी ने पटना से हासिल किया ।शुरू से ही तीक्ष्ण प्रतिभा के धनी जय प्रकाश जी उच्च शिक्षा हेतु अमरीका गए वहां आपने समाजशास्त्र की शिक्षा लेकर पूरे विश्व मे चल रहे पूंजीवाद और मार्क्सवाद संघर्षों को देखा और अपने दिल मे मार्क्स की मोहब्बत को लेकर हिंदुस्तान वापस आये। सन 1929 में भारत लौटकर देश के नेता गांधी को अपना नेता मानकर आपना सपूर्ण जीवन देश और गांधी को समर्पित कर दिया ।
             20 वी शताब्दी के चौथे दशक का यह काल पूरे विश्व मे भयंकर उथल पुथल का काल है। उपनिवेशवाद के चर्मोत्कर्ष और नस्लभेद के सवाल पर दुनिया दो भागो में गोलबन्द हो रही थी । ठीक उसी समय भारत भी आजादी की लड़ाई हेतु पुरानी पीढ़ी को प्रतिस्थापित कर नईपीढ़ी के नेताओ नेहरू, पटेल इत्यादि के साथ गांधी की अगुवाई में एक नई ऊर्जा के साथ खड़ा हो रहा था।उसी समय गांधी ने सविनय अवज्ञा नामक एक सत्याग्रह के माध्यम से एक संघर्ष की उद्घोषणा की जिसके सिपाही के रूप में जय प्रकाश जी भी इस स्वतंत्रता समर में कूद पड़े । गिरफ्तारियो का दौर शुरू हुआ और जेपी गिरफ्ताए कर लिए गए लेकिन जेल भी जेपी के क्रियाकलापों पर पाबंदी नही लगा सका और नासिक जेल में डॉ लोहिया ,मीनू मसानी ,अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता ,यूसुफ देसाई के साथ मिलकर कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की जिसके प्रथम अध्य्क्ष आचार्य नरेंद्र देव बने और प्रमुख सचिव जेपी खुद बने।
         जब मार्क्सवाद के प्रतिनिधि आजादी की अंतिम लड़ाई “भारत छोड़ो”से अलग होकर पूंजीवाद की नींव की ही मजबूत करने का काम कर रहे थे उस समय मार्क्स का यह मानस पुत्र हजारीबाग की जेलों की दिवारो को लांघकर इस आंदोलन को भूमिगत रूप से मजबूत कर देश की आजादी की इस अन्तिम पूर्णाहुति में अपने को झोंके हुआ था।
          आजादी के बाद यह स्वातंत्र्यवीर राजनीति से अलग होकर भूदान और सर्वोदय जैसे गांधी के मंत्रों को लेकर भारत मे सामाजिक आंदोलन की नींव को रखते हुए गाव और गरीब के सवाल को जिंदा कर सामाजिक आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाने में मशगूल थे। यह दौर आजाद भारत के नव निर्माण का दौर था । नेहरू के बाद सत्ता का सिंहासन जब अपने आपको वंशवादी राजनीति हेतु तैयार करते हुए ताकत के मद में चूर थे तो फिर जेपी ने राजनीति में पदार्पण कर देश की सत्ता के सामने आम आदमी के सवाल को उठाते हुए राजनेताओं के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी। जेपी ने गुजरात से छात्रों द्वारा शुरू आंदिलन की अगुआई करते हुए बिहार जाकर 5जून 1974 को गांधी मैदान पटना में एक बहुत बड़ी सभा की।जिसमे छात्रों और नौजवानो ने शिरकत कर देश की शीर्ष सत्ता को चुनौती दी। इस प्रकार भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के सवाल पर शीर्ष सत्ता को घेरते हुआ सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए सत्ता को उखाड़ फेंकने हेतु नौजवानों का आवाह्न किया और इंदिरा को यह कहते हुए कुर्सी छोड़ने को कहा कि ” सिंहासन खाली करो जनता आ रही है”।जिससे भयभीत होकर इंदिरा ने 25 जून1975 को आधी रात को जेपी और उनके साथी नेताओ की गिरफ्तार करवाते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी।18जनवरी 1977 को जब आपातकाल समाप्त हुआ जेपी के नेतृतव में जनता पार्टीने इंदिरा समेत कांग्रेस को हराते हुए देश मे पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनवाई ।
              गांधी की तरह सत्ता में नही सेवा में विश्वास रखते हुए यह लोक नायक मोरार जी को प्रदानमंत्री की कुर्सी पर बैठा कर फिर जनता के बीच चला गया और देश के अंतिम व्यक्ति को मजबूत बनाने मे लग गया।दुर्भाग्य वश इस महानायक की हृदयाघात के कारण अपने 77 वे जन्मदिवस से 3 दिन पूर्व निधन ही गय।
    आज भारत रत्न लोकनायक जयप्रकाश की 115 वी जयंती पर हम यह महसूस कर रहे है कि कोई दूसरा लोकनायक कब आएगा जो सत्ता के मद में चूर सत्ताधीशों के हाथ से सियासत को लेकर आम आदमी के सवालों पर लोकतंत्र के कारवां को आगे बढ़ये।

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