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    भगवान कृष्ण क्यों बने बीर अर्जुन गान्डिंव के सारथी -स्वामी परिपूरणानन्द महराज

    मुंशीगंज/अमेठी 14/10/2017 (अर्जुन शुक्ल सागर,)@www.rubarunews.com >>  एच ए एल कोरवा गेट पर चर रही श्रीमद भागवत कथा के पाचवे दिन कथा यजमान शिवसकंर शुक्ल के यहा संगीत मय मे भक्तो कथा सुनाते  कथा ब्यास स्वामी परिपूर्णा नन्द महराज के कथा सुनाते हुऐ गान्डिंव अर्जुन और भगवान कृष्ण सारथी को पीतांबर धारी चक्रधर भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। उन्होंने अपनी यह भूमिका स्वयं चयन की थी। अपने सुदर्शन चक्र से समस्त सृष्टि को क्षण भर में मुट्ठी भर राख बनाकर उड़ा देने वाले या फिर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान कृष्ण महाभारत में अपने प्रिय सखा धनुर्धारी अर्जुन के सारथी बने थे। इस बात से अर्जुन को बड़ा ही अटपटा लग रहा था कि उसके प्रिय सखा कृष्ण रथ को हांकेंगे। सारथी की भूमिका ही नहीं, बल्कि महाभारत रूपी महायुद्ध की पटकथा भी उन्हीं के द्वारा लिखी गई थी  स्वामीमपरिपूर्णा नन्द महराज ने कहा की बहुत भाग्य से कथा श्रवण का मौका मिलता है और मनुष्य को कथा श्रवण मात्त से ही भवसागर पार होकर मुक्ति मिलती है भागवत कथा मे युद्ध से पूर्व ही अधर्म का अंत एवं धर्म की विजय वह सुनिश्चित कर चुके थे। उसके बाद भी उनका सारथी की भूमिका को चुनना अर्जुन को असहज कर दे
             भगवान कृष्ण सारथी के संपूर्ण कर्म कर रहे थे। एक सारथी की तरह वह सर्वप्रथम पांडुपुत्र अर्जुन को रथ में सम्मान के साथ चढ़ाने के साथ फिर आरूढ़ होते थे और अर्जुन के आदेश की प्रतीक्षा करते थे। हालांकि अर्जुन उन्हीं के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के अनुरूप चलते थे, परंतु भगवान कृष्ण अपने इस अभिनय का संपूर्ण समर्पण के साथ निर्वहन करते थे। 
            युद्ध के अंत में वह पहले अर्जुन को उतार कर ही उतरते थे। भगवान कृष्ण अर्जुन से युद्ध के पूर्व बोले थे, ‘‘हे परंतप अर्जुन! युद्ध की विजय सुनिश्चित करने के लिए भगवती दुर्गा से आशीष लेना उपयुक्त एवं उचित रहेगा। भगवती दुर्गा के आशीर्वाद के पश्चात ही युद्ध प्रारंभ करना चाहिए।’’ 
            सारथी के रूप में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एक और सलाह दी थी, ‘‘हे धनुर्धारी अर्जुन! मेरे प्रिय हनुमान का आह्वान करो। वह महावीर हैं, अजेय हैं और धर्म के प्रतीक हैं। उन्हें अपने रथ की ध्वजा पर आरूढ़ होने के लिए उनका आह्वान करो।’’ आज जो पूरे भारत मे जो चल रहा है उसे देखकर हर मनुष्य को गान्डिव अर्जुन धनषधर की तरह बनकर युध करना पडेगा
    कथा के आयोजक दिवाकर शुक्ल ने बताया की कथा सुनने के लिऐ दूर दराज के भक्त कथा सुनने आ रहे रहे
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