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    विकास को लेकर वोट की राजनीति, विकास नहीं मिलेगे

    अमेठी 12/10/2017 (Yogendra Srivastava UP Head) @www.rubarunews.com >>  विकास को लेकर काफी संसय की स्थित बनी हुई है पिछले 40 वर्षों से देखता हूँ हर चुनाव के पहले  चाहे वह चुनाव ग्राम प्रधान का  हो, नगर पंचायत का हो , नगरपालिका का हो, चाहे क्षेत्र पंचायत का ही, चाहे विधान सभा का हो, या लोकसभा का हो विकास की चर्चा होना आम बात है चुनाव के बाद विकास का अस्तित्व विलीन होना उससे भी बड़ी बात है । विकास की चर्चा होने फिर बन्द हो जाना आम बात हो गयी है। विकास को लेकर बेहद सीधा और सरल सवाल है। विकास हुआ है या नहीं। विकास दिख रहा है। विकास नहीं दिख रहा है। विकास को मापने का और कोई नपना नहीं है। विकास को करने वाला या विकास को देखने वाला और इनके अपने नजरीया होते हैं। स्वार्थ में विकास को परिभाषा करने का एक अपना आधार है। जबकि समाज का विकास के लिए जातियों और मजहबों के समीकरण देखे जाते है।विकास को लेकर वोट की राजनीति होगी, तब सही मायने में विकस नहीं मिलेगे। कारण साफ है कि चुनाव के दौरान ही विकास का पता लगाया जाता है।
             विकास संबंधी सवालों पर राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उनके अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में ही घेरा है। सरकार के तीन साल का हिसाब मांगने वाले राहुल गांधी से अमेठी की जनता तीन पीढ़ी का हिसाब मांग रही है। उन्होंने जानना चाहा है कि अमेठी में एफएम रेडियो स्टेशन क्यों नहीं बना। जिलाधिकारी का कार्यालय क्यों नहीं बना। टीवी यूनिट क्यों नहीं खुली। 24 घंटे बिजली क्यों नहीं आती। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव जीतने के बाद वे अमेठी क्यों नहीं आते। उनसे अच्छी तो स्मृति ईरानी है जो यहां से चुनाव हारने के बाद भी यहां की जनता से मिलने आती हैं। उनकी समस्याएं जानती हैं और उनके समाधान का प्रयास करती हैं। अमित शाह ने कहा कि देश में दो तरह के विकास मॉडल हैं। एक गांधी-नेहरु परिवार का विकास मॉडल और दूसरा नरेंद्र मोदी का विकास मॉडल।
               गुजरात के विकास का मखौल उड़ा रहे राहुल गांधी से उन्होंने उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में सीधा सवाल किया कि अमेठी का उन्होंने कैसा बंटाधार किया है। 70 साल तक कांग्रेस सत्तासीन रही, उसने क्या किया। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने विकास के लिए क्या किया और अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को विकसित करने का बीड़ा उठाया है तो कांग्रेस में छटपटाहट क्यों है? गुजरात की जनता जानती है कि विकास क्या होता है। राहुल तो केवल अपनी अमेठी को ही बता दें कि यहां उन्होंने क्या विकास किया है। जब कांग्रेस सरकार थी तो उत्तर प्रदेश को 2 लाख 80 हजार करोड़ मिलता था। केंद्र सरकार अब उत्तर प्रदेश को 7 लाख करोड़ से ज्यादा पैसा दे रही है।राहुल भक्त सवाल उठा सकते हैं कि क्या अत्यधिक पैसा देना ही विकास की गारंटी है। क्या विकास योजनाओं के बन जाने भर से देश मे विकस आ जाएगा । मूल सवाल व्यवस्था में सुधार के साथ पक्ष और विपक्ष दोनों ही को इस मोर्चे पर लगना होगा, तभी विकास आ पाएगा।
            विकास का सीधा-सादा फंडा यह है कि रोटी-कपड़ा और मकान। देश में सभी को रोटी मिल रही है, यह दावा करने की हिम्मत किसी राजनीतिक दल में नहीं है। आवासीय समस्या को सुलझाने की दिशा में मोदी सरकार गंभीर है। सबको रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में काम हो रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि हाल के कुछ वर्षों में रोटी-कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। देश के कुछ शहर बेहद स्मार्ट हो जाएंगे लेकिन यह सब तब तक संभव होगा जब तक विपक्ष विकास की राह में अपने वोटों का संतुलन देखता रहेगा।  केवल विकास चाहता है। यह कौन कर रहा है, यह सोचना जनता का काम है। नेता तो बस विकास करें। मूल्यांकन का काम जनता पर छोड़ दें। किसी को हिसाब पूछने या देने की जरूरत नहीं होगी। जनता को यह बताने की भी जरूरत नहीं होगी।  एक दूसरे की आलोचना की बजाय केवल विकास को साधने की बात होती। हर हाथ को काम देने की बात होती। राजा भोज की तरह यह जानने के प्रयास होते कि किस घर में चूल्हा नहीं जला। हर घर में चूल्हा जलना सुनिश्चित हो। कानून का राज्य स्थापित हो। इस दिशा में प्रयास की जरूरत होगी।  विकास और किसका विकास।
           अगर देश का एक भी व्यक्ति गरीब है तो इसका मतलब वह विकास से दूर है। अच्छा तो यह होता कि विकास पर राजनीति न होती। विकास में सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी कोशिश करते। हर दल के सांसद, विधायक और नेता अपने संपर्क क्षेत्र के एक गांव को गोद लेते। प्रधानमंत्री की पहल पर कुछ ने ऐसा किया भी है। उसी गांव को विकसित बनाते। वहां स्कूल, अस्पताल खोलते। देखते- देखते सारा देश मे  विकस हो जाता। नेताओं को देश को यह तो बताना ही चाहिए कि वे देश का विकास चाहते हैं या उसका वोट। वोट का दूसरा नाम समर्थन है और समर्थन उसे ही मिलता है जो काम का हो। इस सामान्य बात को राजनीति करने वाले नहीं समझते, यह कैसे कहा जा सकता है? किसने विकास किया है और कितना किया है? कितना अपना विकास किया है और कितना जनता का, यह किसी से छिपा नहीं है? इस द्वंद्व में फंसे बगैर देश के समस्त राजनीतिक दलों से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे केवल अपने क्षेत्र का विकास करें।


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