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    धान की उपज बेंचने को भटक रहा किसान, सरकारी खरीद के नाम पर मजाक कर रही सरकार

    तिलोई/,अमेठी 21/11/2017 (मर्दुल श्रीवास्तव) @www.rubarunews.com >>  किसान धान की फसल बेंचने के लिये दर दर भटक रहा है सरकारी खरीद केन्द्र किसानों के लिये मजाक साबित हो रहे हैं।तिलोई क्षेत्र में अधिकाँश किसानों के पास फाइन महीन धान की उपज हुई है जो अमूमन मोटे धान से महँगा बिकने वाला धान सरकारी खरीद केन्द्रों पर पूछा भी नहीँ जा रहा है मजबूर किसान बिचौलियों के हाथ 1200-1300 रुपये प्रति कुंतल बेंचने को मजबूर है।
                   तिलोई क्षेत्र के तीनो विकास क्षेत्रों में नौ सरकारी खरीद केन्द्र खोले गये हैं परन्तु खरीद के नाम पर केन्द्र व्यवस्थापकों द्बारा लाल भूसी का मन्सुरी धान ही खरीदा जा रहा है जबकि नब्बे प्रतिशत किसानों के पास सफेद भूसी का धान है किसान की इस मजबूरी को कोई देखने वाला न कोई अधिकारी देखने वाला न सरकार के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि ।उधर खरीद में राशन माफिया व राइस मिल मालिकों का गठजोड़ खरीद केन्द्रों की आड़ में केन्द्र व्यवस्थापकों से मिलकर किसानों के हक पर डाका डाल रहा है ।
             आलम यह है की केन्द्र से अधिक राइस मिलरो के यहाँ धान खरीद हो रही और राइस मिलर खरीद केन्द्रों से सांठगांठ कर बिल बनवाकर भुगतान करा रहे हैं।
             हमारे देश में किसान को भगवान कहा जाता है क्योंकि वह धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों ही नहीं बल्कि जीव जन्तुओं तक के पेट भरता है।किसान की खेती ही एक ऐसी जरिया होती है जिससे सभीअपने साल भर पेट भरने की व्यवस्था कर लेते हैं। किसान जो सिर्फ अनाज पैदा करता है उसमें फायदा कम नुकसान होने की आशंका अधिक रहती है क्योंकि खेती मेहनत से ज्यादा मौसम पर निर्भर होती है। किसानों के भी तीन चार वर्ग होते हैं जिनमें किसानों के एक वर्ग को खेतिहर मजदूर दूसरे को लघु सीमांत कहते हैं।दो ढाई हेक्टेयर भूमि वाले किसानों को अनाज पैदा करने में अधिक लागत लगानी पड़ती है जबकि बीस बीघा से अधिक भूमि वालों को लागत कम लगानी पड़ती है।अब किसानों का एक वर्ग ऐसा है जो फार्मिंग करता है और व्यवसायिक खेती करता नही बल्कि करवाता है। इस देश में सबसे ज्यादा परेशान वह किसान  है जो कम खेती करता है। वह अगर अनाज की खेती नहीं करता है और व्यवसायिक करता है तो उसके बच्चे भूखें रह जाते हैं। किसानों का यहीं वर्ग ऐसा होता है जो दैवी प्रकोप या बीमारी से फसल तबाह होने पर बरबाद जाता है और कभी कभी कर्ज से डूबकर जान दे देता है।
    धान खरीद का काला सच 
        किसानों को बिचौलियों सेठ साहूकारों के चंगुल से बचाकर उनके उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार धान गेहूं आदि की सरकारी खरीद मूल्य निर्धारित करके विभिन्न सरकारी व अर्द्धसरकारी संस्थाओं करवाती है।सरकारी खरीद मूल्य व खुले बाजार के मूल्य में थोड़ा अंतर होता है लेकिन वह अंतर कभी कभी कष्टदायक होने लगता है।सरकार की दूकान यानी खरीद केन्द्र पर धान दूबारा सफाई छनाई होती जबकि खुले बाजार में ऐसा कुछ नहीं होता है। सरकारी केन्द्र पर आप जब चाहे तब अपनी फसल बेंचकर पैसा लेकर अपनी जरूरत नही पूरी कर सकते हैं जबकि खुले बाजार में टोकेन नहीं जारी होते हैं बल्कि तत्काल तौल करके भुगतान दे दिया जाता है।इस बार हो रही धान की खरीद सरकार के तमाम दबाव के बावजूद पारदर्शी भ्रष्टाचार रहित नहीं हो पा रही है। कुछ खरीद एजेंसियों ने बिचौलियों के नाम टोकेन सूची में शामिल कर लिये हैं और उनसे डेढ़ सौ से दो सौ रूपया प्रति कुंटल लिया जा रहा है।सरकारी तौल शुरू हुये एक पखवाड़ा बीत गया है और केन्द्रों पर खरीदे गये धान को रखने की जगह नहीं बची है।खरीदे गये धान को केन्द्र से उठाकर उसकी कुटाई करके सरकार को चावल वापस देने वाली चावल मिलें उठान करने में आनाकानी कर रह रही है।इन मिलर्स का तर्क है कि सरकार जितना वापसी चावल मांग रही है उतना नहीं निकल पा रहा है। सरकार सौ किलो धान में सरसठ किलो चावल मांग रही है जबकि मिलर्स कहते हैं कि इतना दे पाना संभव नही है।दरअसल किसान को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं होता है जो घाटे का सौदा करता हो इसलिए मिलर्स भी एक कुंटल में कम से कम दस पांच प्रतिशत अपनी बचत चाहते हैं।कहीं कहीं पर मिलर्स के खिलाफ जिलाधिकारियों को अभियान चलाकर औकात में लाना पड़ा है। सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार केन्द्र स्तर पर दिखता है जबकि इसकी जड़ें ऊपर तक फैली हैं।भारतीय खाद्य निगम के गोदामों पर जिस तरह से खरीद केन्द्र प्रभारियों से वसूली की जाती है यह जगजाहिर है।जब खरीद केन्द्र प्रभारी को खरीदे गये अनाज को सरकारी गोदाम में जमा करने में पैसे देने पड़ेगे तो वह प्रभारी उसकी वसूली किसानों से नही तो किससे करेगा? अगर किसानों से नही करेगा तो मजबूरी में धंधागीरों का अनाज किसान के नाम पर लेना पड़ेगा ।सभी खरीद एजेंसियां या केन्द्र प्रभारी एक जैसे नही होते हैं लेकिन व्यवस्था तो सबको करनी पड़ती है। जब व्यवस्था करनी मजबूरी है तो उसमें अपनी भी कमाई होना जरूरी है।सरकारी खरीद से जहाँ पर किसान अन्य केन्द्रों की अपेक्षा अधिक विश्वास करते हैं वहाँ पर आगामी जनवरी फरवरी तक के टोकेन जारी हो चुके हैं।इस समय किसान को रबी की बुआई करने के लिये पलेवा से लेकर जुताई बुआई खाद दवा हर चींज के लिये पैसे की जरूरत पड़ती है जिसके पास किसानी के अलावा कोई जरिया नहीं होता है उसके पास आमदनी का जरिया सिर्फ अनाज होता है।इस समय किसान को तत्काल धान बेंचकर पैसे की जरूरत है लेकिन धान खरीद केन्द्रों पर उसके समय पर तौल नहीं हो पा रही है। 
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