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    आंतरिक पवित्रता ही जीवन की सच्चाई है: विश्रुत सागर

    भिण्ड 19/नवंबर/2017 (rubarudesk) @www.rubarunews.com >>  आंतरिक पवित्रता ही जीवन की सच्ची माप है जिसका हृदय पवित्र है वह इस सृष्टि का श्रेष्ठतम प्राणी है क्यो कि ऐसा प्राणी समस्त प्रकार के विकारों से रहित होता है। यह बात शहर के आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में मुनि विश्रुत सागर महाराज ने कही।

                धर्म सभा में मौजूद धर्मप्रेमियों से मुनि ने कहा कि इस प्रथ्वी पर विकार रहित मानव परमात्मा की सबसे सुन्दरतम प्रतिकृति है। इस दृष्टि से देखा जाये तो संत इस सृष्टि के ऐसे मानक धरोहर है जिनकी चर्या, वाणी, ज्ञान, जन-जन को आहृलादित करने के साथ साथ प्रबोधित भी करती रहती है। यह प्रबोधन है उन मूल्यों को धारण करने का जो जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों को ही बदल देता है यह उस आचरण की शुचिता का जो जीवन को कुंदन की तरह आभा-वान बना देता है ज्ञान के उस अंकुरण का जो जीवन के समस्त संतापों को क्षणभर मे तिरोहित कर देता है। मुनि श्री ने कहा कि मानव का यह जीवन क्षणभंगुर है। क्षणभंगुर जीवन में (प्रतीति बोध) होना ही इसका सार तत्व है। जीवन भर सुखों की तलाश मे भटकता हुआ मानव सुख की उस प्रतीति का आभाष नही कर पाता जिसे की वह पाना चाहता है वह ऐसा इसलिए नही कर पाता क्यो कि जिसे वह सुख समझता है वह सुख नही बल्कि सुखाभाष है इन आभाषों के फेर मे पढकर वह अम्रत की जगह जहर पीने मे लगा रहता है और उसका यह भ्रम तब टूटता है जब जीवन की संध्या आ जाती है।
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