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    एक ही ईश्वर चराचर जगत् में व्याप्त है सभी धर्मावलम्बी उसी को पाने की जुगत में है

    गाजीपुर4/11/2017 (विकास राय) @ www rubarunews.com >>  सिक्ख धर्म के प्रथम प्रकाश सद्गुरु नानक देव के अवतरण पर्व पर आयोजित प्रकाशोत्सव के अवसर पर श्रीराम पब्लिक स्कूल ,बवाड़ा,गाजीपुर,में
    अयोध्या स्थित श्री माधव कुंज से पधारे श्री श्री 1008 महामण्डलेश्वर श्री शिव राम दास जी फलहारी बाबा के द्वारा ज्ञान के प्रतीक दीप को प्रज्वालित कर कार्यक्रम का शुभोत्घाटन किया गया। इस अवसर पर'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' उक्ति का जिक्र करते हुए आपने बताया कि एक ही ईश्वर चराचर जगत् में व्याप्त है और प्रत्येक धर्मावलम्बी उसी ईश्वर को प्राप्त करने की जुगत में है। जैसे जल,पानी,नीर,वाटर एक ही तत्व के विविध नाम है,वैसे ही राम,रहीम, ईशा आदि एक ही ईश्वर के नाम है। हमारे सद्गुरु जैसे पूज्य नानक साहब उस परम पद तक पहुँचाने के माध्यम है। इनके कृपा के बिना हम उस अनन्त प्रभु को नही प्राप्त कर सकते है। हर शिष्य को गुरु - वाणी में आस्था रखकर अर्जुन की तरह सिर्फ पुतली (लक्ष्य) पर ही ध्यान लगाना चाहिए। गुरु -वाणी ' शुभ करमन ते कबहुँ न टरे ' की व्याख्या करते हुए शुभ कार्यों में सदैव संलग्न रहने की बात कही ।आपने गुरू नानक जी के बारे में बिस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए कहा की गुरुनानक जी का जन्म आज से लगभग 500 वर्ष पहले 15 अप्रैल 1469 को पंजाब के तलवंडी नामक गांव में हुआ था. यह अब ननकाना साहिब,पाकिस्तान मे है. इनके पिता का नाम कालूराय मेहता और माता का नाम तृप्ता था।
    नानक जब कुछ बड़े हुए तो उन्हें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया. उनकी सहज बुद्धि बहुत तेज थी. वे कभी-कभी अपने शिक्षको से विचित्र सवाल पूछ लेते जिनका जवाब उनके शिक्षको के पास भी नहीं होता था जैसे एक दिन शिक्षक ने नानक से पाटी पर लिखवाया.तब नानक ने अ तो लिख दिया किन्तु शिक्षक से पूछने लगे- गुरूजी ! का क्या अर्थ होता है ? यह सुनकर गुरूजी सोच में पड़ गये।
    भला का क्या अर्थ हो सकता है ? ‘तो सिर्फ एक अक्षर है-गुरूजी ने कहा।
    नानक का मन पाठशाला में नहीं रमा. वे अपने गांव के आस-पास के जंगलो में चले जाते और साधू-संतो की संगत करते. उनसे वे ईश्वर,प्रकृति और जीव के सम्बन्ध में खूब बातें करते. नानक का मन पढने-लिखने में नहीं लग रहा यह जब उनके पिता ने देखा तो उनके पिता ने उन्हें जानवर चराने का काम सौंप दिया।
    इसके बाद भी नानक का सोच-विचार में डूबे रहना बंद नहीं हुआ.तब उनके पिता ने उन्हें व्यापार में लगाया. उनके लिए गांव में एक छोटी सी दूकान खुलवा दी. एक दिन पिता ने उन्हें 20 रूपये देकर बाजार से खरा सौदा कर लाने को कहा. नानक ने उन रूपयों से रास्ते में मिले कुछ भूखे साधुओ को भोजन करा दिया और आकर पिता से कहा की वे खरा सौदाकर लाये है. यह सुनकर कालू मेहता गुस्से से भर गये।
    तब माता-पिता ने सोचा की अगर नानक का विवाह कर दिया जाय तो शायद नानक का मन गृहस्थी में लग जाये. इसलिए बटाला निवासी मूलराज की पुत्री सुलक्षिनी से नानक का विवाह करा दिया गया। सुलक्षिनी से नानक के 2 पुत्र पैदा हुए. एक का नाम था श्रीचंद और दुसरे का नाम लक्ष्मीदास था लेकिन विवाह के बाद भी नानक का स्वभाव नहीं बदला।
    विवाह के पश्चात कुछ समय तक उन्होंने सुल्तानपुर नवाब के वहां अनाज बांटने की नौकरी की परन्तु इसे भी छोड़ दिया। अब वे पूरी तरह साधू-संतो की संगत, चिंतन-मनन और ध्यान में रम गये। इस बीच उनके अनेक शिष्य बने। सुल्तानपुर में एक गाने बजाने वाला मरदाना उनका शिष्य बना। उनके साथ नानक ने घर-बार छोड़ दिया और यात्रा में निकल पड़े।
    उस समय सारे समाज में अन्धविश्वास,ऊँच-नीच और जाति-पाति की भावनाएं फैली हुए थी. सरकारी कारिंदे और जमींदार जनता को लूट रहे थे. जनता की ऐसी दशा देखकर गुरुनानक जी जनता के बींच निकल पड़े. सबसे पहले उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी पंजाब की यात्रा की. यात्रा करते हुए वे सैदपुर गांव में पहुंचे. वहां वे लालू नमक एक बढई के घर रुके. यह गरीब, मेहनती, साधू-संतो का सेवक था।
    यह बात गांव घर में फ़ैल गयी की गुरु नानक एक गरीब बढई के घर में ठहरे है. उसी गांव में ऊँची जाति का एक धनवान व्यक्ति भागो रहता था. उसने अपने यहाँ दूर-दूर से संधू-संतो को बुलाकर एक भव्य भोज का आयोजन करवा रखा था. उन्होंने नानक को भोज में बुलाया किन्तु उन्होंने वहां जाने से इंकार कर दिया।
    आखिर भागो ने उनसे अपने यहाँ न खाने का कारण जानना चाहा तो नानक ने कहा- मैं ऊँच-नीच में भेदभाव को नहीं मानता, लालो मेहनत से कमाता है जबकि तुम गरीबो,असहायों को सताकर दौलत कमाते हो। उसमे मुझे गरीबो के छीटे नजर आते है। जब नानक जी ने एक हाथ से लालो की सूखी रोटी और दुसरे हाथ से भागो के घर का पकवान और जब दोनों हाथो को निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला और वही भागो की रोटी से खून निकला। यह देखकर भागो और अन्य लोग भौचक्के रह गये।
    यहाँ से घूमते हुए वे पानीपत के सूफी संत शाह शरफ से मिले, जो उनसे मिलकर बहुत खुश हुआ. इसके बाद उन्होंने बहुत जगहो की यात्रा की. यात्रा करते हुए वे असम पहुंचे, जहाँ एक ऊँची जाति का व्यक्ति खाना पका रहा था. नानक उसके चौके में चले गये।
    यह देखकर वह व्यक्ति नानक पर गुस्सा हो गया और चौके के भ्रष्ट होने की बात कही. यह सुनकर नानकदेव ने कहा की आपका चौका तो पहले से भ्रष्ट है क्योंकि आपके भीतर जो नीची जातियां बसती है, आप उसे कैसे पवित्र करेंगे. यह सुनकर वह आदमी बहुत शर्मिंदा हुआ।
    इस यात्रा में वे कुष्ठ रोगी के घर भी रुके और अपनी सेवा से उसे स्वस्थ बनाया. नानक ने अपनी यात्रा में मक्का और मदीना की भी यात्रा की. कहते है की एक बार भूलवश नानक जी जब लेटे थे, तो उनका पैर काबा की तरफ था।
    एक व्यक्ति ने उनसे कहा की वे अपने पैर काबा की तरफ करके क्यों लेटे है तो नानक ने कहा की तुम मेरे पैर को उधर घुमा दो जिधर  काबा नहीं है। वह व्यक्ति जिधर पैर घुमाता, उधर काबा ही नजर आता. अंत में उस व्यक्ति ने नानक जी से माफ़ी मांगी थी।
    स्कूल प्रबन्धन एवं गॉव के स्नेहीजनों ने महाराज जी को माल्यार्पण कर अभिनन्दन किया।कार्यक्रम का संचालन रीना राय के द्वारा किया गया। फलहारी जी महाराज ने भी उपस्थित सभी लोगों को कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं दी। इसी गांव के शिव मंदिर पर श्री राम कथा संध्या 5 बजे से 7/ 30 तक हो रही है जिसका विराम 8 नवम्बर  को होगा। इस अवसर पर केशव गुप्ता प्रिसिंपल, चन्द्र प्रताप सिंह संस्थापक, अयभय लाल, राजेश सिंह, सौम्य सिंह, काजल दूबे,समेत सभी शिक्षक छात्र छात्राएं उपस्थित थी।
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