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    कलम को स्वतंत्र कर दो, स्वतंत्रता का रहस्य खोल देगी- सुरजीत यादव

    अमेठी 04/11/2017 (सुरजीत यादव) @www.rubarunews.com >>  एक समय था, एक वक्त था, इसी कलम कलम का, जिसने सोयी हुई जवानी में चेतना भर कर उसे बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा भरा था। लोग स्पस्अ कलम की स्पष्ट आवाज पर झूम उठे थे। आक्रान्ता इस मस्ती की झूम को रोक नहीं सके थे। धन्य थे वे कलमकार जिनके हाथ में थी यह कलम, जिस पर नाज था। कमलकारों पर नाज था उस स्वाभिमानी कलम की जिससे आवाज निकली शोषण के खिलाफ अत्याचार के खिलाफ मानव का मानव के प्रति अमानवीय कृत्य के खिलाफ मानव का मानव के
    प्रति अमानवीय कृत्य के खिलाफ दीनों की आवाज बनकर निकली निर्भीक और निडर यह कलम। किन्तु ऐसे बिन्दुओं पर आवाज उठाने की बात करने वाले जो दम्भ भर रहे हैं।  फिर आवाज को गति नहीं है क्यों ? क्योंकि तुम्हारी कलम जकड़ी है राजनीति के जंजीरों से, तुम्हारी दल्लागीरी से, तम्हारी अवैध वसूली से । यदि नहीं तो फिर कुण्ठा क्यों है। आवाज कलम की आवाज पर आक्रान्ता अट्टाहास करता है। जहॉ भयभीत होना चाहिए सवाल है आखिर कलम वही है फिर ऐसा क्यों ? झॉक कर देखता हू तो चह तीव्र तलवार से अधिक धारदार कलम कुण्ठित हो उत्साह के अभाव में जकड़ी है। कलम पकड़ने वालों से यही उम्मीद है। कि ओछी तुच्छ मानसिंकता की जंजीरों में जकड़ी कलम को स्वतंत्र कर दो। फिर देखिए कलम के उत्साह को। जिसकी लोगों को देशवासियों को अपेक्षा है।
         
      उतरिये देशवासियों की अपेक्षा पर खरे। यदि ऐसा करने में तनिक भी हिम्मत नहीं उस कलम में । तो तोड़ दो उस कलम को- जो जकड़ी है राजनीति के जंजीर से, जो जकड़ी है अवैध वसूली से, जो जकड़ी है ग्रसित मांसकिता की जंजीरों । अन्यथा कलम के जकड़े हुये जंजीरों को तोड़ते हुये कलम को दिजिए धार, धार भी ऐसा- जैसा कि देश के तमाम कलमकारों ने धार देकर देश को अपने स्वछन्द लेखनी के बल पर अमानवीय कृत्य करने वाले लोगों को जड़ से ही काट दिया था। 
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