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    23 जनवरी को मनायी जायेगी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विक्रमा राय की पुण्यतिथि

    गाजीपुर20/1/2018(विकास राय) @www.rubarunews.com>> जिला मुख्यालय पर स्थित जिला पंचायत हाल में 23 जनवरी को मनायी जायेगी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विक्रमा राय की पुण्यतिथि।
    स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विक्रमा राय का जन्म 20अक्टूबर1916 को जनपद गाजीपुर के मुहम्मदाबाद तहसील के राजापुर गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री तिलेश्वर राय था । अपने तीन भाईयों मे ये सबसे छोटे थे। इनके दो बडे भाई गंगा राय और जमुना राय थे। इनका मन बचपन से ही पढने लिखने मे नहीं लगता था इसलिए गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद ही पढाई छोड़ दिए।उस समय पूरे देश में अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था जिससे प्रभावित हो कर आप भी उस आन्दोलन मे शामिल हो गए। 14 नवम्बर 1932 को आप अपने एक साथी रामसुंदर गोस्वामी के साथ छपरा पहुंच गये जहाँ अंग्रेजों के खिलाफ विशाल धरना प्रदर्शन हुआ था फिर वहाँ से 2 दिन बाद बलिया जिले के हल्दी मे पहुंचे जहाँ बहुत बडी सभा हुई थी जिसमें पुलिस ने लाठीचार्ज किया और जो लोग नहीं भगे उनको गिरफ्तार कर लिया गया । वहाँ से सभी को गैरजनपद की जेलों में भेजा गया । गया इसी क्रम में आपको जिला जेल जौनपुर मे भेजा गया जहाँ आपको 6 महीने की तनहाई जेल की सजा दी गई । आप 16 वर्ष की अवस्था मे  दिनांक18/11/32को जौनपुर जेल मे बन्द कर दिए गए। उस समय तनहाई की सजा काटने वाले देशभक्तों को अंग्रेजों द्वारा बहुत प्रताड़ित किया जाता था,भोजन भी बहुत खराब मिलता था। जेल में आपको पुलिस द्वारा बहुत पीटा गया था जिससे आपका बांया हाथ टूट गया था ।अपनी सजा पूरी करने के बाद आप अपने साथियों के साथ दिनांक 30/05/33 को रिहा हुये।जेल में आपका स्वास्थ्य खराब हो गया था जिससे आपका शरीर बहुत ही कमजोर हो गया और पेचिश के चपेट में आ गये थे। घर आकर जब आपका इलाज हुआ तो आप धीरे धीरे स्वस्थ हुए। लगभग दो महीने बाद फिर से एक साथी श्री कृष्ण गुप्ता के साथ बनारस चले गए और वहाँ के क्रांतिकारी दल के सम्पर्क में आए,लेकिन घर के लोग समझा बुझाकर वापस लाए ।वापस आने के बाद आप सरजू पाण्डेय के सम्पर्क में आए, इसी बीच पुनः गाजीपुर मे आप गिरफ्तार हुए और पुनः 27/11/34 को आप जिला जेल गाजीपुर मे 6 माह सश्रम कारावास पाकर बन्द कर दिए गये।इस बार आपने अपना नाम पता बदल कर नर्वदेश्वर राय पुत्र सुखदेव राय , सुरवत पाली लिखवाया। वहाँ से सजा पूरी करने के बाद आप बनारस चले गए और लक्ष्मी काटन मिल चौकाघाट मे कपडा बुनना सीखने लगे। यहाँ से अपने एक साथी परशुराम पाण्डेय निवासी वाराणसी के साथ 1941 मे लाहौर चले गए और वहाँ कपडा बुननें का काम करने लगे।धीरे धीरे वहाँ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्पर्क में आए और वहाँ भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ आन्दोलन मे लग गए। उसी समय महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोडो आंदोलन प्रारंभ हो गया और पूरे देश में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध युद्ध शुरू हो गया। एक दिन रात को सभी लोगों के द्वारा सरकारी भवनों पर झंडा और पोस्टर लगाने की योजना बनाई गई।आपको और आपके साथी को उपडाकघर लाहौर पर पोस्टर चिपकाना था। रात के अंधेरे में कुत्तों ने हमला कर दिया और दोनों लोगों को जख्मी कर दिया। इनके साथी को ज्यादा जख्म हुआ था इसलिए वे वापस बनारस लौट आए तथा आप वहाँ से कराची के नौगढ़ गांव चले गए जहाँ पर एक देशभक्त होम्योपैथी के डॉक्टर के यहाँ नौकरी करने लगे।वहाँ से आप मई 1946 मे पुनः गांव आ गए। घर लौटने के बाद आप होम्योपैथी चिकित्सा से रोगियों की सेवा करने लगे और फिर लखनऊ से होम्योपैथी मे प्रमाणपत्र भी प्राप्त कर लिए।उस समय क्षेत्र में कोई डाक्टर नही था इसलिए कई गांवों के लोग उनके पास आते थे ।स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर आपको भारत सरकार द्वारा ताम्रपत्र भी मिला था। आपका स्वास्थ्य 1984 के बाद लगातार बिगडता गया और 23-01-1986 को वाराणसी के कबीरचौरा अस्पताल में आपनी अपनी आखिरी सांस ली और वहीँ मणिकर्णिका घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ आपकी अन्तयेष्टि सम्पन्न हुई ।आपके पौत्र सन्तोष राय के द्वारा हर वर्ष आपकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर स्वतंत्रता संग्राम के सम्मानित सदस्यों को सम्मान देने के साथ साथ नि: शुल्क चिकित्सा कैम्प का आयोजन करा कर उचित जांच, परामर्श एव दवा वितरण के साथ साथ सैकडो गरीब असहाय लोगों को कम्बल भी वितरण किया जाता है।


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