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    रहने को घर नही , सोने को बिस्तर नही - - -

    रामगढ़ (बलिया) (संजय राय/अनिल सिंह) @www.rubarunews.com>> रहने को घर नही सोने को बिस्तर नही, अपना खुदा है रखवाला ,अब तक उसी ने है पाला । किसी फिल्म का यह गाना आज बलिया तहसील के बेलहरी ब्लाक अन्तर्गत  ग्राम पंचायत  गंगापुर के पुरवा  चौबे छपरा के रमेश कुमार पाठक पुत्र स्व0 लक्षमण पाठक  पर सटीक बैठता है । जी हा चले आइये चौबे  छपरा गंगा नदी के किनारे घाट पर । अब तक  लावारिस व जंगली जानवरो को गढ़ो में ठण्डी के मौसम में गुजारा करते हुए देखा होगा , इंसानो को नही । लेकिन आज  एक कटान पीड़ित लाचार मजबुर आदमी   गंगा  घाट पर गन्दगी के बीच एक गढे में इस कड़ाके गलन, हाड़ कपा देने वाली ठन्डी ओर कुहासे मे अपना जीवन ब्यतीत कर रहा है । एक तरफ शासन प्रसासन की  तरफ से गरीबो , लावारिस ,लाचार ,लोगो की मदद में कई योजनाए चल रही है ।
     सरकार की  सारी योजनाओ को ठेगा दिखाता लाचार मजबुर कटान पीड़ित रमेश कुमार पाठक का  गंगा नदी के किनारे घाट पर जानवरो की तरह गन्दगी के बीच गढ़ो मे रात को सोना । इन्सानियत को  सोचने पर मजबुर करती यह घटना , एक ओर जहां झोपड़ी ,टिन शेड,पक्के मकानों मे इन्सान अच्छे भोजन , तोसक, रजाई, के साथ  आराम से रह रहा है । वही कोई मजबुर लाचार गरीब आदमी भुखा जान जोखिम में डाल कर जानवरो ,बिसैले ,जीव जन्तुओ के भय के बाद भी गंगा के अरार मे गढ़ो के अन्दर जीवन गुजार रहा है । रमेश जीवन जीने के लिए हर  दिन घुम घुम कर भोजन मांग मांग  कर पेट भरता है। कोई भोजन कराया तो भला नहीं कराया तो भला नहीं तो भुखे पेट रोज रात में गंगा नदी के किनारे अरार मे जंगली जानवरों द्वारा बनाये गए गढ़ो में सो जाता है । रमेश पाठक पढ़ा लिखा स्नातक लड़का है । रमेश व अन्य लोगों के कहे अनुसार रमेश का पुश्तैनी मकान वर्ष 2013 मे गंगा नदी में आई भीषण बाढ़ के कटान में विलीन हो गया । तब से रमेश की दिमागी हालत खराब हो गया और तभी से वह अपने सगे संबंधियों को छोड़कर विछिप्त अवस्था में इधर उधर जैसे तैसे जिन्दगी गुजार रहा है। आज  रमेश के पास रहने  को घर नही ,सोने को बिस्तर नही ,उसका खुदा है रखवाला । ना जनता की रहम,  ना शासन की नजर , कैसे पहुचेगी शासन के योजनाओ का लाभ देश के अन्तिम व्यक्ति तक । यह यक्ष प्रश्न आज भी बना हुआ है ।
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