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    विवाह बंधन समझौता नही वल्कि जीवन का सर्वोत्तम संस्कार है


    गाजीपुर 10/2/2018(विकास राय) @www.rubarunews.com>>  जनपद के बाराचंवर ब्लाक के असावर में स्थित बुढे नाथ महादेव के मंदिर परिसर में आयोजित श्री रूद्र महायज्ञ के दौरान अयोध्या से पधारे मानस मर्मज्ञ भागवत् वेत्ता महामण्डलेश्वर श्री श्री 1008 श्री शिव राम दास जी फलहारी बाबा ने भगवान श्री राम और माता जानकी के विवाह का प्रसंग सुनाते हुवे उपस्थित श्रोताओं से कहा की विवाह बंधन और समझौता नही वल्कि जीवन का सर्वोत्तम संस्कार है।विशेष रूप से निर्वाह पूर्ण जीवन ही विवाह है।जीवत्मा रूपी कन्या का पाणिग्रहण परमात्मा रूपी वर के हाथ होना ही जीवन की पूर्ण सफलता है।कुल परम्परा रूप और गुण के अनुरूप विवाह से दाम्पत्य के जीवन में शक्ति का संचार होता है।विवाहोपरांत धर्माचरण करते हुए उत्तम संतान की प्रप्ति ही दाम्पत्य जीवन की सफलता है विवाह का उदेश्य सांस्कारिक पुत्र जो समाज में आदर्श को स्थापित करते हुए राष्ट्र का सेवा कर सके ।आज का विवाह प्रायः भोग बंधन और समझौता बन कर रह गया है।जिसका परिणाम तलाक हत्या और आत्म हत्या के रूप में हर समय हर जगह दिखाई दे रहा है।मर्यादा स्व शासन के साथ जीवन जीना ही जीवन की श्रेयस्कर पद्धति है।
            पूज्य फलहारी जी महाराज ने पुष्प बाटिका प्रसंग की ब्याख्या बहुत ही सरल शब्दों में करते हुए कहा की पुष्प बाटिका प्रसंग श्री राम चरित मानस का ह्रदय है ।जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का सर्वोत्तम सोपान है।आपने कहा की राम चरित मानस में दो वाटिका का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है । एक है पुष्प वाटिका और अशोक वाटिका ।पुष्प वाटिका और अशोक वाटिका का अंतर आपने समझाते हुवे कहा की पुष्पवाटिका योगी नगर की वाटिका है तो अशोक वाटिका भोगी नगर की वाटिका है पुष्प वाटिका विदेह नगर की वाटिका है तो अशोक वाटिका देह नगर की वाटिका है।पर दोनों वाटिकाओं का केन्द्रविन्दु माँ जानकी ही रही।राम को सीता से मिलने के लिए पुष्पवाटिका और हनुमान को सीता से मुलाकात करने के लिए अशोक वाटिका में जाना पड़ा।संत एवं सज्जनो की महफ़िल ही वाटिका है जहाँ भक्ति रूपी सीता सदैव निवास करती है।जीवात्मा और परमात्मा के बीच सखी रूपी (देवर्षि नारद जी)महात्मा की  मध्यस्थता से पुष्प वाटिका में राम और सीता का मिलन हुआ।
               सीता विदाई का कारूणिक प्रसंग सुनाते हुए फलहारी बाबा ने कहा कि पिता का ह्रदय बहुत ही कठोर होता है जो पुत्र की मृत्यु पर भी जल्दी रोता नही है पर अपने कलेजे के टुकड़े अपनी लाडली बिटिया को जब डोली पर बिठाता है तो उसके आँखों से बरबस आंसू झरने लगता है। सीता के बिदाई के समय महाराज जनक जैसा पिता भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाये थे।आपने कहा की पुत्र यदि पिता की सम्पत्ति पर राज करता है तो पुत्री अपने पिता के ह्रदय पर राज करती है।पुत्र केवल एक कुल का उद्धार करता है तो पुत्री दो कुल का उद्धार करती है ( बेटी ससुरे में रहिह तू चाँद बनी के )गीत और सीता विदाई प्रसंग सुनकर उपस्थित कथा श्रोताओं की आँखों से गंगा जमुना की धार बरबस ही छलकने लगी। कथा पंण्डाल में उपस्थित सभी श्रोताओं की आंखे नम हो गयी थी।।
    कथा में मुख्य यजमान प्रदीप राय,गोविन्द राय, विक्की राय,अवधेश राय, ओमकार राय, अरबिन्द राय ,हरिशंकर राय ,अजय राय, कृष्णा नन्द उपाध्याय,विजय राजभर,लालबचन यादव,बिरेन्द्र कुशवाहा,आशुतोष राय, यशवंत सिंह,समेत हजारों की संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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