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    अनुभव की लाइब्रेरी है हमारे बुज़ुर्गवान - श्रीरामस्वरूपानंद

    दतिया 16/02/2018 (RamjisharanRai) @www.rubarunews.com>>  श्रीराम कथा आयोजन समिति दतिया के तत्वावधान सबरी धाम बग्गीखाना प्रांगण दतिया में संचालित पावन श्रीराम कथा में श्री कामदगिरि पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्रीरामस्वरूपचार्य जी के श्रीमुख से कथा में अपनी हृदयस्पर्शी विचारों और शास्त्र सम्मत प्रस्तुति करते हुए कहा : 
    लिंग थापि विधिवत करि पूजा।
    शिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।
    भगवान श्रीराम की जन्मलीला, विवाहलीला, वनगमन लीला में सहयोगी रहे भगवान शिव रहे तो अब रणलीला में अलग कैसे रहते। प्रमाण है:

    हमहु उमा रहे तेहिं संगा। 
    रणलीला में विलग नहीं रह सकते अतः वे इस लीला में भी सहयोगी बने क्योंकि अपने आराध्य देव की सभी लीलाओं के पूर्ण होने पर श्रीराम को सकुशल अयोध्या ले जाने की जम्मेदारी भी उनकी है।
    रात्रि में भगवान अपने सेना और सेनानायक बैठे और अनायास प्रश्न कर दिया कि चन्द्रमा में क्या प्रतीत हो रहा है। भगवान का सर सुग्रीव की गोद में था। सुग्रीव जी बोले :

    कहँ सुग्रीव सुनहुँ रघुराई।
    शशि महि प्रकट भूमि छाई।।
    जैसी दृष्टि बैसी सृष्टि। क्योंकि बालि की संपत्ति, जायदाद पर सुग्रीव का लक्ष्य रहा इसलिये उन्हें पृथ्वी की परिछाई दिखाई दी। चहु ओर उन्हें ऐसी ही प्रतीत होती है।अंगद जी कह रहे थे कि ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा की सुंदरता छीन कर रति को दी थी।
    वहीं विभीषण जी को 
    मारहु राहु शशि कहुँ कोई।
    उर महँ परइ श्यामता सोई।।
    चन्द्रमा के उर में राहु ने लात मारी  उसकी नीलिमा है चंद्रमा। क्योंकि विभीषण जी को लंका से लात मारकर उनके अग्रज रावण ने निकाला ।तो उन्हें लात प्रतीत हो रही है।

    भगवान श्रीराम से पूछने पर कहते है गरल बंधु शशि केरा।
    अतिप्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।।

    भगवान ने कहा कि चन्द्रमा ने अपने भाई विष को अपने उर में स्थान दिया है। क्योंकि श्रीराम अपने सभी भाइयों को हृदय में रखते हैं तो उन्हें भाई की प्रतिमूर्ति दिखाई दी।
    जबकि चंद्रमा में अमृत है।
    हनुमान जी से प्रश्न किया तो उनका उत्तर कहा कि कह हनुमत सुनहुँ प्रभु शशि तुम्हार प्रिय दास।
    नीलाम्बुज श्यामलं कोमलांगं। सीतासमारो पितभागम।।
    अर्थात
    हनुमान जी को चन्द्रमा में अपने प्रभु भगवान श्रीराम के दर्शन हुए।
    आचार्य जी ने कहा
           विधि का विधान हमें बिना टीका टिप्पणी सिरोधार्य करना चाहिये। कुल के भविष्य हम जन्मकुंडली न मिलने पर हम दहेजलोलुपता में फंस कुंडली भगवान के चरणों मे रख देते है और उनको ही जिम्मेदार बना देते है लेकिन मांगी भीख (दहेज)में कमीं रहने पर उस समर्पित जन्मकुंडली को उठा लेते है। ऐसे में दोषी कौन। जो अपने कुल भविष्य निर्धारण करने में दहेज लोभ त्याग उचित निर्णय लेना चाहिये।
           बल का प्रयोग समाज मे व्याप्त शोषण को समाप्त करने, अनुचित के विरुद्ध करना चाहिये। बंचित और को शोषित करने में न करें अन्यथा बल का हनन स्वतः हो जाएगा। आज हमारे सामाजिक अगुआ नेताओं को श्रीरामचरित मानस से सीख लेना चाहिए। मंदोदरी अपने पति रावण को समझाती है कि अपने बल का प्रयोग एक अकेली असहाय महिला के हरण, बलपूर्वक उनको अपने अधीन रखना अनुचित है मैं आपके हित  
    रामानुज लघु रेख खिंचाई।
            उनके लघुभ्रात लक्ष्मण जी ने अपने तीर से एक रेखा खींच गए थे। उसको बलवान रावण पार नही कर सका क्योंकि रेखा महिला शक्ति के रक्षण के लिये खीची थी। और न छू पाना यह प्रदर्शित करता है कि स्त्रीशक्ति के हनन का प्रयास करना इतना आसान नहीं। रावण मन्दोदरी से अपनी भुजबल का बखान करता है तो मंदोदरी कहती है कि आप जनकपुर में भुजबल क्यों नही दिखा पाए। भुजबल प्रयोग कर धनुषभंग कर लेआते। ऐसा क्यों नही कर पाए। 
    आपने अपने घी अपनी सामग्री अपनी अग्नि से बानर की पूंछ में आग लगाकर खुद की लंका को आग लगवा ली। कितने ज्ञानी हो।
    आपकी अज्ञानता से आपने अपनी कुगति की ओर अग्रसरता की। आपने अपने बल से पुल निर्माण नहीं कर सके और बानरसेना ने निर्माण कर दिया। अब चेतावनी देते हुए मालवंत (बूढ़े) और मंदोदरी (पत्नी) पतन से बचने को प्रेरित करते है किंतु जब विनाश की घड़ी आती है तो अपनों का मार्गदर्शन भी उचित नही लगता।

    रामादल में बायोवृद्ध मार्गदर्शक जामवन्त और 
    रावणदल में मार्गदर्शक बायोवृद्ध माल्यवंत अपने अपने दल को मार्गदर्शित करते है किंतु रामादल में मार्गदर्शक के अनुसार आगामी रणनीति पर चलते है जबकि रावण दल में मार्गदर्शक के विपरीत नीतियों को अपनाया गया  और विनाश की ओर अग्रसर हुआ रावणदल। 
    भगवान श्रीराम और रावण का युद्ध आरम्भ हुआ ऐसी परिस्थिति में जबकि रावण रथी बिरथ रघुवीर रघुवीरा।
            भगवान से कहा कि हम संसार के कल्याण के लिए युद्धरत है आप इंद्र से रथ मँगवा लीजिये। किन्तु भगवान उत्तर देते है कि जब हमें आवश्यकता होती है तो निषादराज से नाव का सहयोग लेते है क्योंकि वहाँ सहयोगी भावना होती है। कभी बड़े से सहयोग नहीं मांगना चाहिए वह सहयोग नही कृपा होगी।  

           उक्त प्रवाहित संगीतमयी नव दिवसीय श्रीरामकथा आयोजन में मुख्य यजमान श्रीमती प्रभा - जीतेन्द्र सिंह ठाकुर जिलाध्यक्ष सरपंच संघ है। उनके परिजन व मित्रमंडली सहयोगी है। सबरीधाम में भारी संख्या में श्रोताओं की उपस्थिति निरंतर वृद्धि हो रही है।
    कथा पांडाल में मीडया साथी एवं जिले की जनताजनार्दन उपस्थित हो रही है। 
           युद्ध मे युद्धरत भगवान श्रीराम के इकत्तीसवें वान (तीर) में फणीश रूपी विष ने माध्यम से रावण की नाभि में विद्यमान पीयूष शोख लिया और रावण मृत्यु हुई। और धर्मरथ पर रथारूढ़ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम विजयी हुए।

    मंदोदरी के सामने उनके पति की मृतदेह पड़ी तब मंदोदरी कहने लगी

    राम विमुख अस हाल तुम्हारा।
    रहा न कुल कोउ रोवन हारा।।
    अन्यायी की लाश पर कुत्ते गाते गीत।
    आचार्य जी चेतावनी देते है कि अन्याय के विरुद्ध प्रयासरत रहिये। विजयश्री चरणों मे होगी।
    अवध में अवधि के अंतर्गत पहुँचने की चिन्ता भगवान को चिन्ता हुई और रोने लगे कि लघुभ्रात भरत को दिए अवधि में वापिसी होने के वचन की पूर्ति नहीं हुई तो मेरा भाई भरत शरीर छोड़ देंगे अर्थात निष्प्राण हो जाएंगे। इस कारण विमान की गति बढ़ाई किन्तु अवधि में पहुंचना संभव नही था तो भगवान ने अपने भक्त हनुमान को प्रभु के आगमन की सूचना हेतु भेजा गया। और आगमन पूर्व सूचना अवध में पहुंची। और भरत जी को स्वागत करने की तैयारी का निवेदन किया। कि प्रभु अकेले नहीं सीता अनुज सहित प्रभु आवत।
           साथ में बानरसेना भी साथ है। और हनुमान जी ने अपने हृदय में भरत जी को भगवान श्रीराम, माँ सीता व लक्ष्मण दर्शन कराये।
    मिले आज मोहि राम पिरीते।और भरत जी ने उनका आभार किया।
         भगवान ने अपने भ्रातृत्व प्रेम से आविर्भूत होकर उनके सिर पर हाथ रखा तो उलझे हुए केश स्पर्श कर व्यथित हुए तो भरत जी ने इन केशो को समस्या बताया अब आप ही अपनी कृपा से सुलझाईये प्रभु।आचार्य जी ने विद्यमान समस्याओं को सुलझाने हेतु परस्पर बैठकर निबटान करने अर्थात मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाए। भाई भाई की समस्याओं का समाधान भाई ही सुलझा देंगे।
         सनातन धर्म समत्व का सन्देशगामी है। परिवार की समस्याएं परिजन बैठकर समाधान करें तो रामराज्य की परिकल्पना का हमें दर्शन होगा। आज से ऐसे प्रयास करना आरम्भ करें और अच्छे समाज के निर्माण में भागीदार बनें।


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