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    शबरीधाम में हो रही संगीतमयी श्रीरामकथा सुरसरि प्रवाहित

    दतिया 14/02/2018 (RamjisharanRai) @www.rubarunews.com>>  श्रीराम कथा आयोजन समिति दतिया के तत्वावधान सबरी धाम बग्गीखाना प्रांगण दतिया में संचालित पावन श्रीराम कथा में श्री कामदगिरि पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्रीरामस्वरूपचार्य जी के श्रीमुख कथा में
    जीवन मोर राम विनु नाही।
    राम चले वन प्राण न जाही।
    चक्रवर्ती महाराज दशरथ ने कैकेई से कहा कि अपनी 14 वर्ष वनवास की मांग वापस ले लीजिये। राम कभी राज्य की मांग नहीं करेंगे।
    किन्तु कैकेई अपनी मांग पर अडिग रहीं।
    तापस वेश विशेष उदासी।
    चौदह वर्ष राम वनवासी।।
    उक्त त्रिया हठ से आहत होकर महाराज दशरथ ने त्रस्त होकर भगवान श्रीराम से ही आन्तरिक विनय की आप ही उबारिये इस विपत्ति से। उन्होंने सुर्यवंश की लाज की विनती की।
    और शिवजी से विनय की आसुतोष तुम्ह अवढर दानी।
    आरति हरहुं दीन जनजानी।।
    ऐसी संकटकालीन स्थिति में शब्दों का सहयोग करते हुए शिवजी कहते है अब मैं आगया चिंता मत करो। दशरथजी को धैर्य प्राप्त हुआ।
    शब्दरूपी मरहम का लेप भी औषधि से भी प्रभावी हो जातो है।
    त्रेता युग के पिता दशरथ विनय करते है कि मेरा बेटा मेरी आज्ञा की अवज्ञा करदे।और आज के पिता आशीर्वाद चाहते हैं कि हे परब्रह्म मेरा बेटा जीवन मे एक बार मेरी बात मानले। इतना अन्तर आगया युग के प्रभाव से।
    भगवान शिवजी श्रीराम जी की प्रत्येक लीली में सहयोगी है। वचन मोर तजि रहहिं गृह, परिहरि शील सनेहु। वचन मोर तजि 
    इधर भगवान श्रीराम विनती करते है कि महाराज दशरथ के मन को परिवर्तित कीजिये ताकि मेरी लीली पूरी हो सके।
    शिवजी के प्रयास करने के उपरांत भी दहरथ जी लोक परलोक की बिना चिंता किये अनवरत राम के पास रहने की हठ करते रहे।
    चिंता शमशान 
    चिंतन समाधान तक ले जाती है। क्योंकि चिंता में समस्या चित्त में बार बार आती है और समाधान संभव नहीं हो पाता जबकि चिंतन में भगवतदर्शन होता है और समाधान मिल जाता है। ऐसे में दशरथ जी ने चिंतन किया तो शिव दाधीच हरिचंद्र नरेशा।
    सहे धर्म हिट कोटि कलेशा।।
    शिव जी ने सम्राट हरिश्चंद्र को धर्मरक्षण हेतु बिकते हुए दर्शन कराए।
    उक्त लीला दर्शन से दसरथ जी के मन मे परिवर्तन हुआ और श्रीराम वनगमन हेतु मौन स्वीकृति प्रदान करते हैं।निज जीवन का अंत स्वीकारा।

    अनुशासन ही महान बनाता है हमारे समाज में बड़े बड़े औहदों पर विराजे संकुचित और संकीर्ण मानसिकताग्रस्त जबाबदेह दूसरों को अनुशासन का पाठ सिखाते है और अनुसरण की दुहाई देते है और स्वयं कुशासन चलते है। 
    सत्य धर्म की रक्षार्थ हरिश्चंद्र ने पुत्र, पत्नी और राज्य का त्याग कर स्वयं को बेचा और आज के सिंहासनरूण इनके लिये सत्य और धर्म त्याग देते हैं।
    इस लीलादर्शन उपरांत दहरथ जी का मन परिवर्तन होता और वनगमन की मौन स्वीकृति देते हुए रामराम पुकारते रहे और भगवान श्रीराम उनसे दूर और दूर होते गए। माता कौशल्या अपने स्वामी महाराज दशरथ को समझाते हुए ढाढ़स बंधाती है कि केवल 14 वर्ष की बात है उसके बाद हमारे राम आजायेंगे। किन्तु दहरथ जी ने कहा मुझे राम, अयोध्या कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। माता कौशल्या ने कहा शायद आपकी आँखों की रोशनी चली गयी। तब दशरथ जी ने कहा मुझे केवल श्रवण कुमार का मृत शरीर और उनके माता पिता के दर्शन हो रहे हैं।
    अर्थात मेरे प्राणान्त का संयोग आगया। क्योंकि श्रवण के माता पिता की साप स्मरण हुआ और श्रवणकुमार  के बचन भी याद आये की मेरी मृत्यु आपको वरदान साबित होगी। उसी साप के कारण निःसंतान दसरथ को संतान प्राप्ति हुई और पुत्र वियोग में प्राणान्त होगा। 

    तापस अंध-शाप सुधि आई।
    कौशल्यहि सब कथा सुनाई।।
    और दशरथ जी ने प्राण त्याग कर दिए।
    और उधर जटायु जी को श्रीराम दर्शन उनकी अंतिम क्रिया से मुक्ति का कारण बनी।क्योंकि उन्होंने सीताहरण के समय रावण को निज जीवन की चिंता छोड़ दुराचार का विरोध करते है और कहते हैं 
    रे रे दुष्ट ठाणि किन होई।
    निर्भय चलिस न जानिस मोही।
    और
    धावा क्रोधवंत खग कैसे। छूटे पवि पर्वत कहुँ जैसे।।

    इस कृत्य का परिणाम जानते हुए अनाचार का पुरजोर विरोध किया और हमारे देश के एक पक्षी देश की बेटी के संरक्षण का पुरजोर प्रयास किया और 
    चौचन्ह मेरी विदारिस देही।।
    उक्त कृत्य हमें अनुशरण करने को विवश करता है कि हम अपने समाज की बेटियों के विभिन्न प्रतिरूपों के संरक्षण हेतु भरसक प्रयास करें और दूसरों को भी अभियानी बनाएं।

    कथावाचक रामानन्दाचार्य जी ने बताया कि जटायु जी का
    पतित पावन की गोद में जीवन अंत होता है जबकि दशरथ जी का जीवन अंत पत्नी अर्थात कौशिल्या जी की गोद मे होता है। 
    देश के नेताओं पर व्यंग करते हुए रामानन्दाचार्य ने उनकी डनलप के गद्दों पर सोकर राष्ट्र सेवा नहीं कर पा रहे जबकि हमारे राष्ट्र निर्माता और किसान पृथ्वी को विछावन और आकाश को ओढ़ कर सोता है, खेत के ढेलों पर सो जाता है और सुखमय नींद आ जाती है। जबकि उन्हें  गद्दों पर नींद के लिए औषधि लेना पढती है।उक्त प्रवाहित संगीतमयी नव दिवसीय श्रीरामकथा आयोजन में मुख्य यजमान श्रीमती प्रभा - जीतेन्द्र सिंह ठाकुर जिलाध्यक्ष सरपंच संघ है। उनके परिजन व मित्रमंडली सहयोगी है। सबरीधाम में भारी संख्या में श्रोताओं की उपस्थिति निरंतर रह रही है।


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