• --New-- Click here to Watch News channel online.
  • गैर कानूनी तरीके से कमाया गया धन ही काला धन - शिवराज मीणा | Rubaru news
    Powered by Blogger.

    गैर कानूनी तरीके से कमाया गया धन ही काला धन - शिवराज मीणा

    श्योपुर, 25/मई/2018 (rubarudesk) @www.rubarunews.com>> नायब तहसीलदार शिवराज मीणा ने कहा कि गैर कानूनी तरीके से कमाया गया धन ही काला धन या ब्लेक मनी है। यह धन कमाने वाला व्यक्ति सरकार को कर नहीं देता है। जो व्यक्ति कानूनी तरीके से धन कमाता है। वह कमाए गए धन का लेखा-जोखा रखता है और निर्धारित कर सरकार को देता है। यह धन सफेद धन या व्हाइट मनी कहलाता है। बाह्य काला धन और आंतरिक काला धन दो प्रकार का है। वे खटीक समाज के सामुदायिक भवन पर सहभागिता से संचालित एमपीपीएससी निःशुल्क कोचिंग के छात्र-छात्राओं को लेक्चर दे रहे थे। इस दौरान भूगोल विशेषज्ञ विकास सोनी एवं राजनीति विशेषज्ञ आसिफ कुरैशी ने पहले दिन क्लास आने पर अशोक नागर और मुकेश कुमार का स्वागत कलम से किया।
    श्योपुर नायब तहसीलदार शिवराज मीणा ने बताया कि ‘के.एन. वांचू समिति’ ने अर्थव्यवस्था पर काले धन के प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था पर काले धन के बड़े खतरनाक और विनाशकारी प्रभाव पड़ते हैं। आज काला धन देश की प्रगति को गंभीर रूप से अवरुद्ध कर रहा है, क्योंकि काले धन के कारण सरकार को राजस्व-प्राप्ति की सीधे-सीधे हानि होती है।
    ऐसी आय वर्तमान में खर्च कर दी जाती है, जिससे बचत कम हो जाती है। करों की चोरी से प्राप्त आय से धन की असमानता को बढ़ावा मिलता है; चूकि काले धन को न तो बैंकों में जमा किया जा सकता है और न ही प्रतिभूतियों में लगाया जा सकता है।
    इस धन का उपयोग मुख्यत: विलासिता तथा फिजूलखर्ची में किया जाता है। इस व्यय का देश के उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि सीमित साधनों को उत्पादन की बजाय उपभोग में लगा दिया जाता है, जिससे आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
    यही कारण है कि वर्तमान में देश को विकास के लिए जितने साधनों की आवश्यकता है, यथेष्ट रूप में इसीलिए सामने नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि वे संसाधन काले धन के रूप में गुप्त रूप से चलनेवाले व्यवसायों में लगे हैं।
    वास्तव में, काले धन की अपनी अलग अर्थव्यवस्था होती है, जो अदृश्य रूप में सफेद धन की अर्थव्यवस्था के समानांतर कार्य करती है। ये दोनों अर्थव्यवस्थाएँ ठीक उसी प्रकार एक-दूसरे के संपर्क में नहीं आती हैं जिस प्रकार दो समानांतर रेखाएँ एक-दूसरे को नहीं काटती हैं ।
    अत: काले धन को ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ से भी संबोधित किया जा सकता है।
    हम देखते हैं कि काला धन किसी देश की अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित रूपों में घातक प्रभाव डालता है:-
    1. इससे कालाबाजारी, सट्‌टेबाजी, मिलावट तथा तस्करी-जैसे गैर-कानूनी अपराधों को बल मिलता है।
    2. दुर्लभ संसाधनों को अनावश्यक और अनुत्पादक कार्यों की ओर मोड़ देता है।
    3. कर-वंचन से सरकार की सकल आय में कमी आती है और समाज में- संपत्ति और आय का वितरण धनी वर्ग के पक्ष में हो जाता है, जिससे धनी और अधिक धनी तथा निर्धन और भी निर्धन हो जाते हैं।
    4. विलासिता, विदेशी साज-सच्चा तथा उपभोग की वस्तुओं की माँग ज्यादा होती है।
    5. काले धन को सामान्यत: नकद, सोने तथा अन्य मूल्यवान् धातुओं, विदेशी बैंकों, इन्वेंटरी में विनियोजन, निवासीय तथा व्यापारिक भवनों के क्रय, व्यापारिक तथा औद्योगिक पूँजी के रूप में किया जाता है । इस आय को सोने तथा मूल्यवान् धातुओं में लगाना स्फीतिकारक होता है। उन वस्तुओं की माँग बढ़ने से इनका मूल्य बढ़ जाता है।
    6. काले धन को विदेशी बैंकों में जमा करने में घरेलू वित्तीय स्रोत विदेशों को पलायन करने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप देश का भुगतान-संतुलन बिगड़ने लगता है।
    7. काली कमाई से भूमि तथा भवन आदि अचल संपत्ति क्रय करने पर रजिस्ट्रेशन शुल्क की चोरी के साथ ही इनके मूल्य में वृद्धि होती है।
    8. काली आय से हुई बचत को अवैध कार्यों के लिए वित्त के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा यह वित्त का वैकल्पिक स्रोत बन जाती है, जिससे सरकार की मुद्रा संबंधी नीतियाँ असफल हो जाती हैं।
    भारत में वर्तमान समय में कितना काला धन है, यह निश्चित रूप से बता पाना संभव नहीं है। ‘राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान’ ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अरबों रुपए का काला धन है। भारत में कुल जीडीपी का 28 प्रतिशत काला धन है।
    काले धन को बाहर निकालने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित उपाय अभी तक प्रयोग में लाए गए हैं या लाए जा रहे हैं
    1. काले धनधारियों से यह अपेक्षा करना कि वे स्वत: तथा स्वेच्छापूर्वक अपने काले धन को प्रकट कर दें।
    2. सरकार ऐसे दीर्घकालीन धारक बॉण्ड जारी करे, जिन पर निम्न दर से ब्याज दिया जाए तथा धन विशेष निवेश करनेवालों को भी यह आश्वस्त करे कि निवेश किए गए धन के स्रोत के बारे में बॉण्डधारियों से कुछ नहीं पूछा जाएगा। इस उपाय से दबा हुआ काला धन प्रचलन में आकर सरकार के योजना-कार्यो में व्यय होगा तथा उत्पादन-वृद्धि हो सकेगी।
             इस योजना के कई लाभ भी सरकार ने बताए परंतु व्यवहार में यह योजना असफल ही रही, क्योंकि लगभग पिछले कई वर्षों  से इस योजना का कोई विशेष लाभ सरकार को नहीं मिल सका है। वास्तव में, सरकार करवंचकों तथा काली आय प्राप्त करनेवालों को इस योजना के प्रति पूर्ण आश्वस्त नहीं कर पाई है, इसलिए इन धारकबौंण्डों के प्रति काले धनधारकों ने विशेष रुचि नहीं दिखाई है।
    3. विमुद्रीकरण भी एक कारगर उपाय हो सकता है। इसका अर्थ होता है, अर्थव्यवस्था में अधिक मूल्य के करेंसी नोटों को रद्‌द कर देना, क्योंकि काला धन आमतौर पर इन्हीं नोटों के माध्यम से संचालित होता है। यद्यपि यह एक आसान और अच्छा उपाय है।
    4. कर की अधिकतम सीमांत दर में कमी करने पर काला धन निकालने में सहायता मिल सकती है। करों की ऊँची दरें अनेक कठिनाइयों तथा जोखिमों के बावजूद कर-वंचन को लाभप्रद तथा आकर्षक बनाती हैं; करों की ऊँची दरें उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं तथा अधिक प्रयत्न करने के मार्ग में मनोवैज्ञानिक बाधा उत्पन्न करती हैं, साथ ही लोगों की बचत और निवेश की इच्छा और क्षमता को भी कम करती हैं।
    5. यदि सरकार तस्करी की रोकथाम में सफल हो जाए तो काले धन का एक बहुत बड़ा भाग समाप्त किया जा सकता है।
    इसके अंतर्गत रोकथाम और गुप्तचर शाखा को सुदृढ़ बनाना, विदेशी विनिमय अधिनियम के प्रविधानों को कड़ाई से लागू करना, आर्थिक और कानूनी उपाय तथा पड़ोसी राष्ट्रों से द्विपक्षीय समझौते इस राजनीति के मुख्य उद्‌देश्य हैं। यह उपाय यदि सतर्कता, ईमानदारी तथा वैज्ञानिक ढंग से प्रयोग में लाया जाए तो परिणाम उत्साहवर्धक होंगे।
    6. कर-विभाग द्वारा डाले गए छापों से भी काले धन का पर्दाफाश होता है। काले धन को निकालने के लिए ऐसे व्यक्तियों, जिन पर संदेह होता है, के घरों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर समय-समय पर छापे डाले जाते हैं। यदि छापों की संख्या बढ़ा दी जाए तथा कर-विभाग इन छापों का क्रियान्वयन अधिक ईमानदारी और सतर्कतापूर्वक बड़े-बड़े तस्करों, सट्‌टेबाजों तथा जमाखोरों पर केंद्रित करे तो परिणाम उत्साहवर्धक रहेंगे।
    7. सरकारी नियंत्रण तथा लाइसेंसों की न्यूनतम संख्या रखने पर भी काला धन अंशत: सामने आ सकता है।
    8. देश में काले धन के निर्माण तथा संग्रह के लिए राजनेता काफी हद तक उत्तरदायी रहे हैं। वांचू समिति के अनुसार राजनीतिक दलों को चंदा देने के कारण जो राशि कुल आय में से घटाई जाए वह सकल आय की 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए ।
    9. व्यय-कर को पुन: लागू किए जाने से भी काले धन पर नियंत्रण किया जा सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आज भारत की अर्थव्यवस्था में काला धन इस प्रकार शामिल हो गया है कि वास्तविक प्रचलित धन के समानांतर काले धन की अर्थव्यवस्था चल रही है, जो कि हमारी अर्थव्यवस्था को घुन की तरह खोखला करती जा रही है ।
    10. सभी आयकर-अधिकारियों के तबादले साल भर के अंदर एक स्थान से दूसरे स्थान पर कर दिए जाएँ तथा जिन स्थानों पर उनकी नियुक्ति की जाए वे उनके स्थायी निवास-स्थान से दूर हों। जो नए अधिकारी हैं उनके संबंध में यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जहाँ उन्होंने अंतिम शिक्षा प्राप्त की है, वहाँ भी उनकी नियुक्ति न की जाए।
     11. चुनाव में धन के बढ़ते प्रभाव और चुनाव खर्च में हुई भारी वृद्धि को देखते हुए एक महत्त्वपूर्ण सुझाव यह दिया जा सकता है कि सरकार की ओर से उम्मीदवारों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। राजनीतिक दल जो रकम अपने उम्मीदवारों को दे, उसकी सीमा भी निश्चित हो।
                   काला धन मुख्यत: विलासिता तथा फिजूलखर्ची में व्यय होता है, जो कि अनुत्पादक कार्य है। यह व्यय प्रथम तो देश की बचत को कम करता है। दूसरे, देश के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, क्योंकि सीमित साधनों (आर्थिक) को उत्पादन के आधार पर उपभोग में लगाने पर स्वाभाविक है कि देश का आर्थिक विकास अवरुद्ध हो जाएगा ।
                      भारत सरकार इस विकट समस्या से भली-भांति परिचित है तथा उसके निवारणार्थ प्रयासों में लगी हुई है। आयकर उपबंधों के अंतर्गत केंद्रीय सरकार को ऐसी अचल संपत्ति को अधिग्रहण करने का अधिकार है, जिसका उचित बाजार मूल्य एक लाख रुपए से अधिक हो।
                      संपत्ति के बेनामी धारण की पद्धति पर अंकुश लगाने के उद्‌देश्य से यह आवश्यक कर दिया गया है कि संपत्ति के वास्तविक स्वामी को संपत्ति के अर्जन के एक वर्ष के अंदर आयकर आयुक्त को सूचित करना अनिवार्य होगा। किसी भी मामले में, जहाँ एक वर्ष में कुल कारोबार ४० लाख रुपए से अधिक का होगा, लेखा पुस्तकों का लेखा परीक्षक द्वारा परीक्षण भी अनिवार्य कर दिया गया है।
                      सरकार यदि कर-चोरी को घटाना चाहती है तो आयकर, प्रत्यक्ष-करों आदि की सीमांत दर, जो कि देश की तीव्र मुद्रा-स्फीति संदर्भ में काफी ऊँचे हैं, को कम कर, दे, कर-चोरों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की जाए कर-प्रशासन को अधिक चुस्त तथा निपुण बनाकर आर्थिक नियंत्रण, परमिट, कोटा, लाइसेंस आ हैदि को सीमित तथा जरूरी होने पर ही लागू किया जाए अधिक संख्या में तथा सार्थकतापूर्वक छापे मारकर, उपभोक्ता पदार्थो का उत्पादन बढ़ाकर, चुनाव-काल में राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जानेवाले चंदे पर रोक लगाकर ही काले धन की समस्या से उचित तथा प्रभावशाली ढंग से निबटा जा सकता है।
                        इसके अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यक्षमता में वृद्धि करके देरी की प्रवृत्ति से मुक्ति पाना भी जरूरी होगा। विदेशी विनिमय की चोरी तथा तस्करी रोकने के लिए कोफेपोसा आसल्ख की व्यवस्थाओं को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
                     संदिग्धों की जाँच तथा सभी कर-विभागों में उचित समन्वय होना अत्यावश्यक है । इस प्रकार उन समस्त स्रोतों को समाप्त करने में सफलता मिलेगी, जो काले धन को उत्पन्न करने में सहायता प्रदान करते हैं।
    वास्तव में, भारत में काला धन खूब फल-फूल रहा है। बड़े लोगों के विरुद्ध जैसी कार्यवाही होनी चाहिए नहीं हो पाती है। इसका मूल कारण हमारे नैतिक स्तर और सामाजिक मूल्यों में आई गिरावट है। इसीलिए नैतिकता का प्रशिक्षण और व्यवहार प्रत्येक स्तर पर अपेक्षित है।
                  सुबह 7 बजे से 8 बजे तक इतिहास विशेषज्ञ खेमराज आर्य, सुबह 9 बजे से 10 बजे तक राजनीति विशेषज्ञ आसिफ कुरैशी और 10 बजे से 11 बजे तक भूगोल विशेषज्ञ विकास सोनी ने लेक्चर दिया। क्लास की निगरानी चित्रा कुशवाह ने उपस्थित रहकर की।
    Share on Google Plus

    About Rubaru News

    This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.
      Blogger Comment
      Facebook Comment

    0 comments:

    Post a Comment