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    गोवर्धन की पूजा से इंद्र समझ बैठे स्वंम का अपमान, भगवान कृष्ण ने बचाया उनके प्रकोप से


    भिण्ड 13/11/2018 (rubarudesk) @www.rubarunews.com>> शहर के अटेर रोड इलाके में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठें दिन आर्चाय ब्रजेश शास्त्री ने अपने प्रवचनों में कहा कि भगवान कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी इंद्र की पूजा करते हैं। जब उन्होंने अपनी मां से पूछा कि इंद्र की पूजा की जाती है तो उनकी मां बोली कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है और हमारी गायों को चारा मिलता है। जिस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि हमारी गांय तो गोर्वधन पर्वत पर चरती हैं और हमें इसी की पूजा करनी चाहिए। उनकी बात मान कर सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। जिस पर देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझ लिया और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी। इसके बाद इंद्र को पता लगा कि श्री कृष्ण वास्तव में विष्णु के अवतार हैं और अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में इंद्र देवता को भी भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी। इन्द्रदेव की याचना पर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और सभी ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर साल गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट पर्व मनाए। तब से ही यह पर्व गोवर्धन के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान श्रृद्धालुओं ने मौके पर गोवर्धन पूजा कि और भगवान कृष्ण की लीलाओं पर चल रहे प्रवचनों का लाभ लिया। श्रीमद्भागवत कथा के अगले चरण में कथा वाचक आर्चाय जी ने कालीया नाग के अंत का वर्णन किया और कहा कि ब्रजवासी यमुना में कालिया नाग के प्रकोप से त्रस्त थे और भगवान कृष्ण को यह बात पता चली तो उन्होंने अपनी लीला के अनुसार काले नाग के प्रकोप का खात्मा करने का विचार किया और उन्होंने कालिया नाग का अंत किया। श्रीमद्भागवत कथा में जुट रही श्रृद्धालुओं की भीड से आयोजक इनके बैठने व पानी आदि का इंतजाम कर रहे हैं और हर रोज भीड बढ़ती जा रही है।

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