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    लोक आस्था का महापर्व छठपूजा पर बोईसर में होगा बड़ा कार्यक्रम


    पालघर(महाराष्ट्र).10/11/2018 (OmPrakashDwivedi) @www.rubarunews.com>>समूचें बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं झारखंड के बाद अब देश के विभिन्न राज्यों समेत विश्व में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जा रहा अस्तांचल सूर्य एवं उगते सूर्य को अर्घ्य देने वाला महापर्व छठ पूजा का आगाज रविवार से चार दिनों के पूरे भाव एवं विकट तपस्या के पूजा की तैयारियों की शुरूआत हो गयीं है.।
                 कार्तिक मास के चतुर्थी  रविवार 11 नवम्बर से शुरू हो रहा आस्था का चार दिन का कठिन तपस्या के पर्व कि समापन बुधवार 14 नवम्बर को सुबह सूर्य देव के पाव फठते अर्घ्य देखर संपन्न होगा.।
                 पालघर जिले में उत्तर भारतीयों में आस्था के इस महापर्व को लेकर महिलाओं एवं पुरुषों में काफी लम्बे दिनों से बनी रही उत्सुकता को लेकर ईस बार औद्योगिक  शहर बोईसर के घाट बेटेगाँव पर बिहार सेवासंघ की ओर से विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिये रंगमंच पर महुआ टीवी के फेम तमाम कलाकारों में प्रियंका सिंह समेत अन्य कलाकारों का बेहद अनुठा पारंपरिक भक्ति गीतों के कार्यक्रम के बीच जिले के माटी के मानूस सपूतों समेत उत्तर भारतीयों के योगदान पर सम्मानित भी किया जायेगा.।
                कार्यक्रम के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे संयोजक बिहार सेवासंघ एवं महाराष्ट्रा खादी भंडार बोईसर के प्रमुख बबन कुमार सिंह कहते है कि बिहार की माटी से सुदुरवर्ती जगहों पर आस्था बिखेरती छठ मैय्या की पूजा को स्थानीय भुमिपुत्रों के पुरे सहयोग से ऐतिहासिक रूप से मनाया जा रहा है.।
                चार दिनों तक चलने वाले कठिन तप की इस महापर्व छठपूजा में नियमों का बड़ा ख्याल रखते हुए 36 घंटों तक पानी भी ग्रहण नही करते है.।
                  कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि रविवार से शुरू हो रहे महापर्व छठ को नहाय खाय के नाम से जाना जाता है.।घर के पुरे साफसफाई के बाद छठब्रती लोग साफसफाई से नहा धोकर साफ कपड़े पहनकर शुद्ध शाकाहारी सेंधा नमक एवं घी से बना अरवाँ चावल कद्दू की सब्जी एवं चने की दाल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है.।
                 दूसरे दिन कार्तिक मास के पंचमी सोमवार के दिन ब्रतधारी स्त्री-पुरुष पुरे दिन उपवास रखकर सायंकाल में पुनः स्नानादि के बाद मिट्टी के चूल्हे पर नये चावल का खीर गन्ने के रस,गाय की दूध से बनाते हुए घी की चुपड़ी रोटी  का प्रसाद बनाकर भगवान को भोग लगाने के बाद पासपड़ोस, ईष्ट मित्रों में बांटकर  स्वयं छठब्रती खरना करती है.।
                  महाछठ ब्रतधारी लोग फिर 13 नवम्बर षष्टी मंगलवार को सायं पूरे दिवस उपवास के बाद सायं अस्तांचल सूर्य को अर्घ्य और दूसरे दिन सुबह उषाकाल में सप्तमी को उगते सूर्य को पानी में खड़े होकर पूजन करते गाय की दूध के अर्घ्य से कठिन तपस्वी ब्रत को प्रसाद वितरण करते हुए संपन्न करते है.।


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