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    शिशुपाल व अन्य राजाओं की सेना को नष्ट कर किया भागवान कृष्ण ने रुकमणी से विवाह


    भिण्ड 15/11/2018 (rubarudesk) @www.rubarunews.com>> शहर के अटेर रोड इलाके में बॉम्बे बिल्डिंग के सामने आयोजित हो रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में आर्चाय ब्रजेश शास्त्री ने रुकमणी विवाह का वर्णन किया और अपने प्रवचनों में कहा कि महाराज भीष्मक अपनी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से करना चाहते थे, जब यह बात भीष्म अपने महल में बैठकर करते थे तो रुकमणी अपने अंदर ही अंदर खुश होती थी, लेकिन इनके भाई को यह बात राश नहीं आती थी। आर्चाय जी ने कहा कि सत्य सत्य ही होता है। जब रुकमणी की विवाह की सभी तैयारियां शिशुपाल के साथ कराने की परन्तु उनका पुत्र राजी नहीं था। वह रुकमणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। क्योंकि शिशुपाल श्रीकृष्ण से द्वेष रखता था। भीष्मक ने अपने बड़े पुत्र की इच्छानुसार रुकमणी का विवाह शिशुपाल के साथ ही करने का निश्चय किया।
    उसने शिशुपाल के पास संदेश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर दी। जब इस बात पता लगा तो वह बड़ी दुरूखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारका कृष्ण के पास भेजा और इस संदेश में कहा कि मैं आपको छोडक़र किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। मेरे पिता मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहते हैं। विवाह की तिथि भी निश्चित हो गई। मेरे कुल की रीति है कि विवाह के पूर्व होने वाली वधु को नगर के बाहर गिरिजा का दर्शन करने के लिए जाना पड़ता है। मैं भी विवाह के वस्त्रों में सज धज कर दर्शन करने के लिए गिरिजा के मंदिर में जाऊंगी। मैं चाहती हूं, आप गिरिजा मंदिर में पहुंचकर मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें। यदि आप नहीं पहुंचेंगे तो मैं आप अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी। यह संदेश पाकर भगवान श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर शीघ्र ही कुण्डिनपुर की ओर चल दिए। उन्होंने रुकमणी के दूत ब्राह्मण को भी रथ पर बिठा लिया था। श्रीकृष्ण के चले जाने पर पूरी घटना बलराम के कानों में पड़ी। वे यह सोचकर चिंतित हो उठे कि श्रीकृष्ण अकेले ही कुण्डिनपुर गए हैं। अत: वे भी यादवों की सेना के साथ कुण्डिनपर के लिए चल पड़े। आर्चाय जी ने आगे वर्णन करते हुए कहा कि भीष्मक ने पहले ही शिशुपाल के पास संदेश भेज दिया था। फलत: शिशुपाल निश्चित तिथि पर बहुत बड़ी बारात लेकर कुण्डिनपुर जा पहुंचा। बारात क्या थी, पूरी सेना थी। शिशुपाल की उस बारात में जरासिंध, पौण्ड्रक, शाल्व और वक्रनेत्र आदि राजा भी अपनी-अपनी सेना के साथ थे। सभी राजा भगवान कृष्ण से शत्रुता रखते थे। विवाह का दिन था। सारा नगर बंदनवारों और तोरणों से सज्जित था। मंगल वाद्य बज रहे थे। मंगल गीत भी गाए जा रहे थे। पूरे नगर में बड़ी चहल पहल थी। नगर नगरवासियों को जब इस बात का पता चला कि श्रीकृष्ण और बलराम भी नगर में आए हुए हैं, तो वे बड़े प्रसन्न हुए। वे मन ही मन सोचने लगे, कितना अच्छा होता यदि रुकमणी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ होता, क्योंकि वे ही उसके लिए योग्य वर हैं। विवाह के वस्त्रों में सज धजकर गिरिजा के मंदिर की ओर चल पड़ी। उसके साथ उसकी सहेलियां और बहुत से अंगरक्षक भी थे। वह अत्यधिक उदास और चिंतित थी, क्योंकि जिस ब्राह्मण को उसने श्रीकृष्ण के पास भेजा था, वह अभी लौटकर उसके पास नहीं पहुंचा था। रुकमणी ने गिरिजा की पूजा करते हुए उनसे प्रार्थना की हे मां तुम सारे जगत की मां हो! मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं श्रीकृष्ण को छोडक़र किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं करना चाहती। रुकमणी जब मंदिर से बाहर निकली तो उसे वह ब्राह्मण दिखाई पड़ा। यद्यपि ब्राह्मण ने रुक्मिणी से कुछ कहा नहीं, किंतु ब्राह्मण को देखकर रुक्मिणी बहुत प्रसन्न हुई। उसे यह समझने में संशय नहीं रहा कि श्रीकृष्ण भगवान ने उसके समर्पण को स्वीकार कर लिया है। रुकमणी अपने रथ पर बैठना ही चाहती थी कि श्रीकृष्ण ने विद्युत तरंग की भांति पहुंचकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींचकर अपने रथ पर बिठा लिया और तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े। आर्चाय जी ने आगे प्रवच में कहा कि इस बात की क्षण भर में ही संपूर्ण कुण्डिनपुर में ख़बर फैल गई कि श्रीकृष्ण रुकमणी का हरण करके उसे द्वारकापुरी ले गए। शिशुपाल के कानों में जब यह समाचार पहुंचा तो वह क्रुद्ध हो उठा। उसने अपने मित्र राजाओं और उनकी सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण का पीछा किया, किंतु बीच में ही बलराम और यदुवंशियों ने शिशुपाल आदि को रोक लिया। भयंकर युद्ध हुआ। बलराम और यदुवंशियों ने बड़ी वीरता के साथ लडक़र शिशुपाल आदि की सेना को नष्ट कर दिया। तत्पश्चात रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ हुआ। श्रीमद्भागवत के अंतिम दिन आर्चाय जी के प्रवचों को सुनने के लिए धर्मप्रमियों व श्रृद्धालुओं की भीड उमडी और लोंगों ने कथा का लाभ लिया।

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