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    निजी हौसले से दी सामुदायिक प्रेरणा- विद्याथियों और शिक्षक बिरादरी का बढ़ाया मनोबल

    श्योपुर22/11/2018 (rubarudesk) @www.rubarunews.com>> रोग ने दोनों आंखों की रौशनी छीन ली। हादसे में एक पैर गंवा दिया। काल ने पहले पत्नी को अपना निवाला बनाया। त्रासदी से उबर पाते उससे पहले इकलौती बेटी भी चल बसी। बहुत कुछ खोया लेकिन नहीं खोया सब्र और साहस। एकाकी हो कर लिया प्रेरणा के दीप जलाने का संकल्प। हाथ में थामी आत्मबल की मशाल और निकल पड़े उजाला बांटने। यह किसी फिल्म की नहीं एक जीते-जागते इंसान की कहानी है। जिनके लिए जीवन का मक़सद है देश की भावी पीढ़ी यानि बच्चों को तनाव से उबारना। साथ ही उन्हें राह सुझाने वाले शिक्षकों को गुरुत्तर दायित्व निभाने के लिए प्रेरित करना। जी हां, हम बात कर रहे हैं देवेन्द्र सिंह अहलूवालिया की जो गत दिवस श्योपुर प्रवास पर आए। शिक्षक के बाद 18 वर्ष प्राचार्य रहे श्री अहलूवालिया विद्यार्थियों व शिक्षकों से रूबरू हुए। 
           
    प्रेरक कार्यक्रम मॉडर्न कॉन्वेंट स्कूल के तत्वाधान में आयोजित किया गया। जिसका उद्देश्य बोर्ड परीक्षाओं से पहले विद्यार्थियों के तनाव और भय को खत्म करना था। दिल्ली से श्योपुर आए श्री अहलूवालिया का स्वागत स्कूल की संचालक श्रीमती रुचिता तनेजा सहित सहयोगी स्टाफ ने किया। इसके बाद अपने प्रेरक उद्बोधन में श्री अहलूवालिया ने विद्यार्थियों को जीवन, परिश्रम, एकाग्रता और लक्ष्य के महत्व से परिचित कराया। उन्होंने तमाम उदाहरणों के साथ सफलता अर्जित करने के गुर भी बच्चों को दिए। उन्होंने शिक्षक समुदाय को भी आज के माहौल के मुताबिक संवेदनशील तथा समर्थ बनने के लिए प्रेरित किया। जीवन को संघर्ष के बाद भी ईश्वर का अमूल्य वरदान बताते हुए श्री अहलूवालिया ने कहा कि हारना जीवन नहीं है। जीत की चाह लेकर बेहतर प्रयास करना ही जीवन है।
                  उल्लेखनीय है कि श्री अहलूवालिया ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी। जो बाद में 14 वर्ष तक दक्षिण भारत के विभिन्न शहरों में प्राचार्य रहे। उन्होंने विदेश में भी 4 साल तक प्राचार्य पद का दायित्व संभाला। वर्ष 2011 में धर्मपत्नी के निधन के बाद समाज के लिए जीने का संकल्प लिया। वर्ष 2017 में इकलौती बेटी की मौत ने उन्हें पूरी तरह तन्हा कर दिया। शारीरिक व्याधियों और निःशक्तता ने बाधक बनने का काम किया। किन्तु उच्च मनोबल के धनी श्री अहलूवालिया ने देश का भ्रमण कर समुदाय हित में प्रेरणा का अलख जगाने का बीड़ा उठा लिया। जिसे विद्यार्थियों और शिक्षकों ने भरपूर मान-सम्मान दिया।


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