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    बच्चों को सुरक्षा प्रदान करता है ‘‘पॉक्सो एक्ट‘‘


    श्योपुर, 29/मई/2019 (rubarudesk) @www.rubarunews.com>>  समाज में नैतिक आचरण का ह्रास होता दिख रहा है। सबसे दुखद है छोटे बच्चों के साथ अनाचार. इससे न केवल बच्चे और उसके परिवार को त्रासदी से गुजरना पड़ता है बल्कि पूरा समाज इस अपराध से शर्मसार होता है। भारतीय संविधान में विभिन्न अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है किन्तु बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं था। इसका एकमात्र कारण यह है कि हमारे समाज ने इस तरह के अपराध की कल्पना भी नहीं की थी। कालान्तर में बच्चों के साथ निरंतर बढ़ते अपराधों की बढ़ती संख्या को देखकर सरकार ने इस पर नियंत्रण पाने के लिए वर्ष 2012 में एक विशेष कानून बनाया, जो कि प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट 2012 नाम से जाना जाता है। यह अधिनियम बच्चों को सेक्सुअल हैरेसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों, छेडखानी, बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है।
                 वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है. इस अधिनियम की धारा 4 में वो मामले संज्ञान में लिये जाते हैं, जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो। इसमें सात साल सजा से लेकर उम्र कैद और अर्थ दंड भी लगाया जा सकता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुँचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लडके और लडकी को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है। 
    पास्को एक्ट में संशोधन
                      बारह वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म में फाँसी की सजा का प्रावधान तो पहले ही हो गया था, लेकिन आइपीसी में हुए संशोधन से यौन शोषण का शिकार होने वाले बालक छूट गए थे। अब बालकों को भी यौन शोषण से बचाने और उनके साथ दुराचार करने वालों को फाँसी की सजा का प्रावधान किया गया है। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन उत्पीडन से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉस्को) 2012 में संशोधन को 6 अगस्त 2018 को मंजूरी दी गयी है। संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। 
    पॉस्को एक्ट के प्रावधान
                     पॉस्को एक्ट में यौन शोषण की परिभाषा में यौन उत्पीडन, अश्लील साहित्य, सेक्सुअल और गैर सेक्सुअल हमले को शामिल किया गया है। एक्ट में भारतीय दंड संहिता 1860 के अनुसार सहमति से सेक्स करने की उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 साल किया गया है। एक्ट के अनुसार अगर कोई व्यक्ति (बच्चा, युवा व बुजुर्ग सभी) किसी बच्चे यानी 18 साल से कम उम्र के बच्चे या बच्ची के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के कोई यौन कृत्य करता है तो यह पॉक्सो एक्ट के दायरे में आएगा। इस एक्ट के तहत सभी अपराधों की सुनवाई एक स्पेशल कोर्ट में कैमरे के सामने होती है। एक्ट में कहा गया है कि सुनवाई के दौरान यह कोशिश होनी चाहिए कि पीड़ित के माता-पिता या वह जिस पर वह भरोसा करता है, मौजूद रहें। यदि पीड़ित बच्चा दिव्यांग है या मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर है, तो विशेष अदालत को उसकी गवाही को रेकॉर्ड करने या उसे समझने के लिए अनुवादक व विशेष शिक्षक की सहायता लेनी चाहिए। अगर आरोपी ने कुछ ऐसा अपराध किया है जो बाल अपराध कानून के अलावा अन्य कानून में भी अपराध है, तो उसे सजा उस कानून के तहत होगी, जो सबसे सख्त हो। इसमें खुद को निर्दोष साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है। इसके अलावा इसमें गलत आरोप लगाने, झूठी जानकारी देने व किसी की छवि को खराब करने पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। ऐसे लोग जो गलत काम के लिए बच्चों का व्यापार करते हैं, वे भी इस कानून के दायरे में आते हैं।
    1 साल में करना होगा पाॅक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों का निराकरण

                 अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि यदि कोई शख्स ये जानता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ  है, तो इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो उसे 6 महीने की जेल और आर्थिक दंड की सजा मिल सकती है। यह कानून बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है। इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल सहित अन्य जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं। इसके अलावा पुलिस की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि वह मामले की जानकारी 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति को भी दे, जिससे सीडब्ल्यूसी समिति बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके। एक्ट में ये भी प्रावधान किया गया है कि बच्चे की पहचान गुप्त रखी जाए. पॉक्सो के तहत स्पेशल कोर्ट पीड़ित बच्चे को दी जाने वाली मुआवजे की राशि का निर्धारण कर सकता है। एक्ट में यह भी कहा गया है कि केस को यौन शोषण होने की तारीख से एक साल के अंदर निपटाया जाना चाहिए। पॉस्को एक्ट में अपराधियों के लिए कड़े दंड का प्रावधान है। ऐसे में हमारा दायित्व है कि हम सब मिलकर अपराध को रोकें और अपराधी को दंड दिलायें ताकि अपराधियों के मन में डर बना रहे।

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