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    तुम ज्यादा नहीं सिर्फ इतना करो, कुछ बनो ना बनो आदमी तो बनो: निराला


    भिण्ड (rubarudesk) @www.rubarunews.com>> साहित्यकार की कलम से निकला हुआ प्रत्येक शब्द अपने आप में ब्रह्म स्वरूप होता है। रचना वैश्विक स्तर पर तब स्वीकार होती है जब उसने जनहित और जनमन रंजन का सुंदर समावेश हो। रचना की पवित्रता का ध्यान रखना प्रत्येक रचनाकार का नैतिक दायित्व है। और यह साहित्य की उच्चता का प्रतीक भी है। यह बात अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति के संभागीय अध्यक्ष तथा राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित साहित्यकार डॉक्टर सुनील त्रिपाठी निराला ने  गणेश महोत्सव, पर्यूषण पर्व एवं मोहर्रम के पवित्र मौके पर आयोजित मासिक का काव्य उजास में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही। गोष्ठी में अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति के संभागीय सचिव किशोरीलाल बादल, संभागीय सचिव आशुतोष शर्मा नंदू तथा युवा व्यवसाई प्रशांत जैन ने भी अपने विचार व्यक्त किए। डॉ निराला ने रचना पाठ करते हुए कहा तुम जिय़ादा नहीं सिर्फ इतना करो, कुछ बनो ना बनो आदमी तो बनो। कौन कहता इरादों की मंजिल नहीं, हौसला तो रखो, सब्र थोड़ा करो। ओज के युवा कवि आशुतोष शर्मा नंदू ने घनाक्षरी सुनाते हुए कहा हिंद का विचार है ये, हिंद का मिजाज है ये, भाईचारा विश्व में बना रहे बना रहे । धर्म कोई घी रहे सभी के प्रति समभाव आदमी के मन में बना रहे बना रहे । गज़़लकार किशोरीलाल बादल ने कहा ए शहर तेरा दिल को मेरे भा गया। चलते-चलते कहां से कहां आ गया। युवा व्यवसाई प्रशांत जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि सामाजिक समरसता भारत की प्रमुख विशेषता है। इस भावनाओं को बनाए रखने के लिए प्रत्येक नागरिक को सजग रहना चाहिए।

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